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बुधवार, 21 मई, 2008 को 13:44 GMT तक के समाचार
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भारत आए पाकिस्तानी हिंदुओं की पीड़ा

अदालत से राहत पाने वाला परिवार
दिलीप के परिवार को यहाँ रहने के लिए फ़िलहाल अदालत का सहारा मिला है
सरहद पार कर शरण के लिए भारत आए पाकिस्तान के एक हिंदू परिवार को यहाँ बने रहने के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

सरकार ने इस परिवार की वीज़ा की अवधि बढ़ाने से इनकार कर दिया और वापस जाने का फ़रमान पकड़ा दिया.

हालांकि अब अदालत ने सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है.

पाकिस्तान छोड़कर भारत आ बसे हिन्दुओं ने भी सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन किया है.

हालांकि यह परिवार अकेला हिंदू परिवार नहीं है जो पाकिस्तान से आया है और इस तरह की परेशानी झेल रहा है.

जैसा कि पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए लड़ाई लड़ने वाली संस्था के लोग बताते हैं ऐसे दो हज़ार पाकिस्तानी हिंदू हैं जो नागरिकता का इंतज़ार कर रहे हैं.

ताज़ा मामला

जोधपुर में रह रहे दिलीप मेघवाल और उसके परिवार को मंगलवार को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और वापस पाकिस्तान जाने को कहा.

मगर पाकिस्तान से आए हिंदुओं ने इसका जमकर विरोध किया और कहा कि अगर इस परिवार को वापस भेजा गया तो उन्हें यातनाएँ झेलनी पड़ेंगीं.

प्रशासन ने इस परिवार को एक दिन की मोहलत दी थी.

मगर बुधवार को जोधपुर हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश पर रोक लगा दी. कोर्ट ने सरकार से जवाब भी तलब किया है.

अदालत के आदेश पर दिलीप ने बीबीसी से कहा, "जान बची और लाखों पाए."

उनका कहना था, ''वहाँ जाते तो हमारी जान ख़तरे में थी. मगर अफ़सोस सरकार हमारी पीड़ा को समझ नहीं रही थी."

"अगर वहाँ सुरक्षा होती तो हम यहाँ क्यों आते? वहाँ हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ बहुत ज़ुल्म होता है."

शिकायत

दिलीप अपनी पत्नी दुर्गा, सास देवी और दो बच्चों - साहिल और समीर के साथ पाकिस्तान के रहीमयारख़ान ज़िले से वर्ष 2004 मे भारत आए थे और यहीं रहने की इच्छा जताई थी.

मगर वो एक बार फिर वापस पाकिस्तान लौट गए.

 इनमें से ज़्यादातर या तो दलित हिंदू हैं या फिर आदिवासी भील हैं. भारत को यह मसला पाकिस्तान के साथ उठाना चाहिए
हिंदू सिंह सोधा

हाल में वे परिवार फिर भारत आए और स्थायी तौर पर यहीं रहने की इच्छा व्यक्त की. मगर सरकार ने उनके वीज़ा की अवधि बढ़ाने से इनकार कर दिया और उनके निष्कासन की कार्रवाई शुरु कर दी.

पुलिस ने इस परिवार को हिरासत में ले लिया.

पाकिस्तान के इन हिंदू अल्पसंख्यकों के हितों पर काम कर रहे पाक-विस्थापित संघ के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोधा कहते हैं कि ये वो लोग हैं जो वहाँ भी धार्मिक आधार पर जुल्मो-सितम उठाते हैं और यहाँ भी उनकी सुनवाई नहीं होती.

उनका कहना था, "इनमें से ज़्यादातर या तो दलित हिंदू हैं या फिर आदिवासी भील हैं. भारत को यह मसला पाकिस्तान के साथ उठाना चाहिए."

अधिकारियों ने बीबीसी से कहा कि हम सरकार की नीति और नियमों के तहत ही कार्रवाई कर रहे थे, इसमें कहीं ज़्यादती की कोई बात नहीं है.

पनाह की चाह

पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के सूबा सिंध और पंजाब से बड़ी तादाद में हिंदू अल्पसंख्यक पनाह के लिए भारत आते रहे हैं.

प्रदर्शन करते लोग
शिकायत है कि न उनको पाकिस्तान में चैन है न भारत में कोई सुध ले रहा है

इन लोगों का कहना है कि वहाँ उनका धर्म के आधार पर उत्पीड़न किया जाता है.

पिछले कुछ सालों में भारत ने ऐसे 13 हज़ार लोगों को भारत की नागरिकता दी है. लेकिन विस्थापित संघ के अध्यक्ष सोधा का कहना है कि अब भी कोई दो हज़ार पाकिस्तानी हिंदू नागरिकता का इंतज़ार कर रहे हैं. मगर सरकार का रवैया ठंडा है.

दिलीप के एक रिश्तेदार बीरबल ने बीबीसी से कहा, "हम दो पाटों के बीच पिस रहे है."

इन लोगों का कहना है कि चूँकि वो दलित और ग़रीब हैं, इसलिए उनके साथ हर स्तर पर ज़ुल्म और भेदभाव होता है.

पाकिस्तान से आए माखन कहते हैं, "वहाँ स्कूलों मे हमारे बच्चों को ज़बरदस्ती इस्लामिक पाठ्यक्रम पढ़ना पड़ता है."

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "भारत और पाकिस्तान दोनों को अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर बैठ कर बात करनी चाहिए."

ये वो इंसानी समाज है जिसके रिश्ते-नाते, घर-परिवार, गाँव-देहात तो बँटे मगर उसके बीच में एक ऐसी रेखा खींच गई जिसे सरहद कहते हैं.

इसने इस खाई को इतना गहरा कर दिया कि वो दो देशों की दया पर निर्भर हो गए.

हिंदुओं का पवित्र चिन्ह ओइमपाकिस्तानी हिंदू
बहुत से पाकिस्तानी हिंदुओं को अपने वजूद और भविष्य की चिंता है.
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