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शुक्रवार, 21 मार्च, 2008 को 12:08 GMT तक के समाचार
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हिंदुओं की होली में मुसलमानों के रंग

गोटे बनाते आवाज़ मोहम्मद
गोटे बनाने का काम मनिहारी बिरादरी अर्से से कर रही है लेकिन काम अब घट रहा है
रंगों के त्योहार होली पर राजस्थान में मुसलमानों की मनिहार बिरादरी के दस्तकार राजे-महाराजों को लाख के गुलाल गोटे उपलब्ध कराते रहे हैं.

गोटे एक गोलाकार डिब्बी होती है जिसे लाख से बनाया जाता है और इसमें रंग-गुलाल भरा जाता है. इसे फेंक कर भी रंग उड़ेला जाए तो जिसे लगे, उसे कोई चोट नहीं लगती.

गोटे बनाने के काम में हालाँकि अब मुनाफ़ा नहीं रह गया है लेकिन ये दस्तकार सैकड़ों साल पुरानी परंपरा अब भी ज़िंदा रखे हुए है.

इन्हें इस हिंदू त्योहार पर अपने हिंदू भाई-बहनों को गोटे में रंग और गुलाल मुहैया कराने पर सुकून मिलता है.

होली पर हर तरफ़ रंगों की बरसात और बौछार के बीच रंग-पिचकारी ने आधुनिकता का बाना पहना है लेकिन सिद्धहस्त शिल्पी आवाज़ मोहम्मद के हाथ गुलाल गोटे बनाने में जुटे हैं.

उनके पुरखे सदियों तक राजे-महाराजाओं की होली मे अपने हुनर के रंग भरते रहे हैं.

पुराना दौर

आवाज़ मोहम्मद इतिहास में झाँकते हैं, "उस दौर की बात ही कुछ और थी. ये हमारी सातवीं पीढ़ी है जो इस काम को रही है."

पुरखों की परंपरा...
 हम मुनाफ़े के लिए नहीं बल्कि पुरखों की परंपरा को ज़िंदा रखने के लिए गोटे बनाते है. जब हिंदू भाई हमारे गुलाल गोटे को होली पर ख़ुशी के साथ इस्तेमाल करते हैं तो अच्छा लगता है
अनवर जहाँ, दस्तकार

वे कहते हैं, "पहले और आज में बहुत फ़र्क आया है. हमारे पुरखे महीने भर पहले ही इस काम में लग जाते थे. कलात्मक गुलाल गोटे में रंग-गुलाल भरकर बाज़ार में सजा कर रखे जाते थे."

आवाज़ कहते हैं कि अब यह कला हाशिए पर आ गई है और इसमें बमुश्किल 50-60 परिवार ही रह गए हैं.

आवाज़ मोहम्मद का परिवार अब भी पूर्व राजपरिवार को रंगों से भरे अपने गुलाल गोटे उपलब्ध कराता है.

इस कला में लाख, बटन व बिरोजा से गुलाल गोटे बनते हैं और उसमें अरारोट से बना ख़ुशबूदार गुलाल-रंग भरते है.

एक गुलाल गोटे का वज़न पाँच ग्राम से ज़्यादा नहीं होता. इसलिए कोई रंग से भरे गोटे किसी को दे मारे तो भी उसे नुक़सान नहीं पहुँचता.

दस्तकार गुलरुख सुल्ताना कहती हैं कि इसमें सब चीज़ें प्राकृतिक है इसलिए यह नुक़सानदेह नहीं है.

सुल्ताना कहने लगीं, "हम मुसलमान हैं और ये हिंदुओं का त्योहार है. हम रंग-गुलाल के गोटे बनाते हैं. इसमें सामाजिक सद्भाव और कौमी एकता भी निहित है. वैसे भी हम मिलजुलकर त्योहार मनाते हैं. ये हमारी परंपरा रही है."

उपेक्षा से निराशा

अंगीठी की आँच पर पिघली लाख को फुकनी से गोलाकार बनाते परवेज़ मोहम्मद ख़ुद इसी मनिहार बिरादरी से हैं.

क्या देगा ज़माना...
 ये बेसबात ज़माना सबात क्या देगा, जो ख़ुद हो मौत की ज़द में, वो हयात क्या देगा
आवाज़ मोहम्मद, गोटे बनाने वाले दस्तकार

वे इस गुलाल गोटे की ख़ूबी बयाँ करते है, "हिंदू पुराणों में आग, पानी और लाख को शुद्ध माना जाता है. हम इन्हीं तीन चीज़ों से ये गुलाल गोटे बनाते हैं. इसमें कोई रसायन ऐसा नहीं है जो ख़राबी करे."

एक दस्तकार अनवर जहाँ को दुःख है कि सरकार अब ऐसे कलाकारों को प्रोत्साहित नहीं करती.

उनका कहना है, ''हम मुनाफ़े के लिए नहीं बल्कि पुरखों की परंपरा को ज़िंदा रखने के लिए गोटे बनाते है. जब हिंदू भाई हमारे गुलाल गोटे को होली पर ख़ुशी के साथ इस्तेमाल करते हैं तो अच्छा लगता है."

अपनी कला के प्रदर्शन में देश-विदेश घूमे आवाज़ मोहम्मद कहते हैं, "हमारी कला किसी की मोहताज़ नहीं है.

सरकारी उपेक्षा से नाराज़ आवाज़ एक शेर सुनाते हैं, "ये बेसबात ज़माना सबात क्या देगा, जो ख़ुद हो मौत की ज़द में, वो हयात क्या देगा."

हिंदुओं के त्योहार पर रंग-गुलाल मुहैया कराने वाले दस्तकारों से उनकी मुराद पूछी तो कहा, "अल्लाह ने बख्शा है जन्नत सा वतन हमको, इस देश को यारों दोजख़ न बना देना. होली धूम से मनाओ."

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