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तमिलनाडु में अब भी दलितों के साथ भेदभाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की आज़ादी के 60 साल बाद भी तमिलनाडु के कई ऐसे इलाक़े हैं जहाँ दलितों के साथ छुआ-छूत और ऊँच-नीच जैसा भेदभावपूर्ण बर्ताव होता है. आज भी दलितों को न केवल चाय अलग ग्लास में पीनी पड़ती है बल्कि बाल कटाने के लिए दलित उसी नाई की दुकान पर नहीं जा सकते जहाँ तथाकथित उच्च जाति के लोग जाते हैं. यहाँ तक कि दलितों को वो मंदिर, वो श्मशान और नदी का वो घाट भी इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है, जिन्हें तथाकथित ऊँची जाति के लोग इस्तेमाल करते हैं. हाल के अध्ययनों से ये बात सामने आई है कि तमिलनाडु में दलितों को 45 अलग-अलग तरह का छुआ-छूत झेलना पड़ता है. हालाँकि तमिलनाडु देश के दूसरे राज्यों के मुक़ाबलों में राजनीतिक तौर पर ज़्यादा प्रगतिशील और शिक्षा के मामले में भी आगे माना जाता है. नफ़रत की दीवार पिछले दिनों तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से महज़ 600 किलोमीटर दूर मदुरै ज़िले के उथापुरम गाँव में ऊँची जाति के लोगों के दलितों को अलग करने के लिए एक दीवार खड़ी करने की ख़बर आई थी. वहाँ की ऊँची जातियों के हिन्दुओं का कहना है कि 1980 के दशक में विभिन्न जातियों के बीच भड़के दंगों के बाद उन्हें ये दीवार खड़ी करने की इजाज़त दी गई थी. उस गाँव में दलित बहुमत में हैं और अधिकतर आर्थिक तौर पर कोई ख़ास बुरी स्थिति में भी नहीं हैं. बाद में राज्य सरकार के आदेश पर इस दीवार को गिरा दिया गया ताकि दलित कहीं भी आ या जा सकें. इस दीवार को गिराने की घोषणा मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने ख़ुद विधानसभा में की थी. ऊँची जाति का विरोध इस दीवार के गिराए जाने के बाद गाँव के तथाकथित ऊँची जाति के तक़रीबन 800 लोगों ने विरोध दर्ज कराने के लिए गाँव छोड़ दिया था लेकिन अब वे वापस आ गए हैं. महत्वपूर्ण सवाल ये खड़ा होता है कि क्या गाँव में दीवार गिरा दिए जाने से तमिलनाडु में दलितों की स्थिति में कोई बदलाव आने वाला है ? एक जाने-माने दलित विश्लेषक रवि कुमार का कहना है, "इससे दलित में अपने अधिकारों के प्रति एकजुटता बढ़ने नहीं वाली है क्योंकि अन्य जगहों पर इस तरह की दीवारें नहीं हैं. छुआ-छूत के कारण हो रहे अन्य तरह के भेदभावों के ख़िलाफ़ लड़ाई इस लड़ाई के मुक़ाबले में काफ़ी मुश्किल होगी. तमिलनाडु की आबादी तक़रीबन सवा छह करोड़ है. इनमें दलित या अनुसूचित जाति के लोगों की जनसंख्या 19 प्रतिशत है. अगर ये संगठित तौर पर किसी एक राजनीतिक दल या उम्मीदवार के पक्ष में वोट करें तो ये लोग चुनावों पार्टी को वोट दें तो चुनावी नतीजे बदल सकते हैं.
लेकिन उन्हें अब भी न्याय या समाज और सत्ता में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिल पाई है. आर्थिक तौर पर इन्होंने प्रगति की है लेकिन ये दलित अब भी बहुत कम कमा पाते हैं. राज्य विधानसभा में उनके लिए कुछ सीटें अलग से आरक्षित भी हैं और इस समुदाय से कुछ सदस्य कैबिनेट में भी हैं लेकिन इनके पास कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं हैं. दलित ईसाइयों की दशा तमिलनाडु के ईसाइयों में से 60 फ़ीसदी दलित हैं. ज़्यादातर ने धर्म-परिवर्तन इसलिए किया था ताकि उन्हें और आज़ादी या अधिकर मिल पाएँ. लेकिन दलितों के लिए गिरजाघरों में अलग इबादत के स्थान, कुछ जगहों पर तो अलग चर्च और कब्रिस्तान हैं. इसलिए वे ख़ुद को वहाँ भी अलग-थलग पाते हैं. हाल ही में इरायुर गाँव में दलितों को मुख्यधारा में शामिल करने की कुछ कोशिशें की गईं जिससे की उन्हें समान अधिकार मिलें. लेकिन ईसाइयों के एक गुट ने इसका जमकर विरोध किया और धमकी दी कि यदि ऐसी गतिविधियाँ जारी रहीं तो वे दोबारा हिंदू धर्म अपना लेंगे. चर्च अधिकारियों को झुकना पड़ा. इन लोगों ने तो विरोध जताते हुए एक चर्च को ताला लगा दिया. अब किसी तरह इन्हें मनाया जा रहा है कि चर्च दोबारा खोला जाए. राज्य में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष फ़ादर विनसेंट चिन्नादुरई कहते हैं, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन बिशप दलितों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए एक हद से आगे नहीं बढ़ सकते. रूढ़ीवादी मानसिकता को बदलने और आधुनिक दुनिया की असलियत से समझौता कराने में लंबा वक़्त लगता है." |
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