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शंकराचार्य की गिरफ़्तारी से दलित ख़ुश! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ओर तो कांचीपीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ़्तारी गरमागरम ख़बर बनी हुई है और राजनीतिक गहमागहमी बढ़ी हुई है. लेकिन दूसरी ओर कांचीपुरम के ग़ैरब्राह्मण और ख़ासकर दलित समाज की प्रतिक्रिया ठंडी है बल्कि समाज का एक हिस्सा तो शंकराचार्य पर आई मुसीबत से ख़ुश भी है. कांचीपुरम का जनजीवन भी इस विवाद से आमतौर पर प्रभावित दिखाई नहीं देता. दलित विरोधी छवि चेन्नई से क़रीब दो घंटे की दूरी पर है प्राचीन मंदिरों और दुनिया भर में प्रसिद्ध साड़ियों का शहर कांचीपुरम. जितना प्रसिद्ध यह मंदिरों और साड़ियों के लिए है उतना ही प्रसिद्ध यह शंकराचार्य के मठ के लिए भी है. यूँ तो कांची के पुराने शंकराचार्य की छवि एक आध्यात्मिक नेता की होती थी लेकिन पिछले कुछ दशकों में वर्तमान शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने अपने राजनीतिक संबंधों और अयोध्या के मसले पर अपनी सक्रिय मध्यस्थता के कारण अपनी एक अलग छवि बना ली है. लेकिन अपने ही मठ के एक पूर्व कर्मचारी की हत्या के मामले में गिरफ़्तार होने के बाद शंकराचार्य एक अलग तरह के विवाद में फँस गए हैं. वैसे कांचीपुरम मठ के लोग मठ प्रशासन में ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों में कथित रुप से संलग्न होने के लिए चर्चा में रहे हैं. कांची मठ को ब्राह्मणवाद का प्रतीक माना जाता है शायद इसीलिए ग़ैर ब्राह्मण समुदाय ख़ासकर दलित समाज शंकराचार्य की गिरफ़्तारी से ख़ुश दिखता है. ग़ैर ब्राह्मण लोगों का कहना है कि शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती न केवल छुआछूत में विश्वास करते हैं बल्कि उन्होंने मठ के कार्यो से इसका प्रचार भी किया है और दलितों पर कई सौ सालों से चले आ रहे सामाजिक पाबंदियों को सही ठहराया है. 'मक्कल मंडरम' नाम की संस्था की महासचिव महेश ने कहा, "पिछले साल शंकराचार्य ने एक बयान में कहा कि दलित साफ़ नहीं होते और उन्होंने नौकरी कर रही महिलाओं को चरित्रहीन भी बताया." कांचीपुरम के ग़ैर ब्राह्मण समुदाय जैसे वनियार, मुदलियार और चेट्टियार भी शंकराचार्य की गिरफ़्तारी से प्रभावित दिखाई नहीं पड़े. एक नौजवान रवि ने कहा, "शंकराचार्य की गिरफ़्तारी अब ब्राह्मण-ग़ैर ब्राह्मण में बँट गई है. शंकराचार्य ने ग़ैर ब्राह्मणों के लिए कुछ नहीं किया." जनजीवन सामान्य जिस समय कांची के मठ पर ग्रहण लगा हुआ दिखाई पड़ रहा है वहीं कांचीपुरम में जनजीवन सामान्य दिखाई देता है.
स्कूल और दुकानें सामान्य रुप से खुली हुई हैं. मठ के आसपास पुलिसकर्मियों और मीडिया के लोगों के अलावा इक्का दुक्का उत्सुक लोग ही दिखाई पड़ते हैं. लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया के बारे में कांचीपुरम में रहने वाले युवराज कहते हैं, "शंकराचार्य ने हमारे लिए कुछ नहीं किया. ब्राह्मणों को नौकरी दिलवाई, उनकी सहायता की और ग़ैरब्राह्मणों को नज़र अंदाज़ किया." जयेंद्र सरस्वती को जब गिरफ़्तार किया गया तो वहाँ दिवाली मनाई जा रही थी. कुछ दलित नौजवानों का कहना था कि इस बार उन्होंने दिवाली ज़्यादा ख़ुशी के साथ मनाई. अम्बेडकर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट यहाँ सक्रिय एक संस्था है. इस संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि शंकराचार्य दलित विरोधी कार्य ही करते रहे हैं. बीबीसी से हुई बातचीत में कई लोगों ने कहा कि सामाजित कुरीतियों और दकियानूसी सोच को बढ़ावा देकर शंकराचार्य ने अपने आपको आमलोगों से अलग रखा. शायद यही कारण है कि जब शंकराचार्य मुसीबत में हैं तब यहाँ का दलित और ग़ैर ब्राह्मण समाज उनकी मुसीबत से ख़ुश हो रहा है. |
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