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मुस्लिम लॉ बोर्ड भी 'आतंकवाद' के ख़िलाफ़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दारुल-उलूम के बाद अब मुसलमानों की अहम संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी कहा है कि 'इस्लाम में आतंकवाद के लिए कोई स्थान नहीं है'. कोलकाता में शनिवार को होने जा रहे बोर्ड की वार्षिक बैठक के एक दिन पूर्व बोर्ड के नेताओं ने कहा है कि इस्माम निर्दोष और असहाय लोगों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की हिंसा की अनुमति नहीं देता. इससे पहले गत 25 फ़रवरी को उत्तर प्रदेश के देवबंद शहर में आयोजित देश के सर्वोच्च इस्लामिक सम्मेलन में दारुल-उलूम ने एक घोषणापत्र जारी करते हुए 'आतंकवाद' की सभी कार्रवाई को ग़ैर इस्लामी क़रार दिया था. भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ की व्याख्या करने वाली सर्वोच्च संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव सैयद निज़ामुद्दीन ने कहा, "आतंक के इस्तेमाल की इस्लाम में कोई जगह नहीं है, न पवित्र क़ुरान में इसकी हिमायत की गई है और न हमारे महान नेताओं ने इसकी वकालत की है." हालांकि बोर्ड के नेताओं ने अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में अमरीकी फ़ौजों के ख़िलाफ़ लड़ाई को जायज़ ठहराया. सैयद निज़ामुद्दीन ने कहा, "पश्चिमी ताक़तें हमलावर ताक़ते हैं और जिन लोगों ने उनके ख़िलाफ़ हथियार उठाए हैं वे धर्म की रक्षा कर रहे हैं." यह पूछे जाने पर एकाएक मुस्लिम धार्मिक नेता 'आतंकवाद के ख़िलाफ़' क्यों खड़े हुए दिख रहे हैं, बोर्ड के सहायक सचिव मौलाना अब्दुर्रहमान क़ुरैशी ने कहा, "भारत में सभी आतंकवादी घटनाओं के लिए मुस्लिम ग़लत तरीक़े से दोषी ठहरा दिया जाता है. इसलिए हमें लगा कि इस मामले को साफ़ करना ज़रुरी है." मौलाना क़ुरैशी ने कहा, "जब भी देश में कोई बम विस्फोट होता है तो हमारी समुदाय पर ऊँगली उठा दी जाती है. ख़ुफ़िया एजेंसियाँ और पुलिस हमेशा हमारे लोगों पर आतंकवादी घटनाओं के लिए शक करती है. यह ग़लत है. हम चाहते हैं कि जाँच एजेंसियाँ खुले दिमाग़ से काम करें." उनका कहना था कि 'मुस्लिम स्कूल और मदरसों को आतंक के ट्रेनिंग केंद्र' के रुप में प्रचारित किया जाता रहा है. देवबंद घोषणापत्र पिछले सोमवार को दारुल-उलूम के आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में सभी तरह की हिंसा और आतंकवाद की आलोचना करते हुए एक घोषणापत्र को पारित किया गया था. इस सम्मेलन में हज़ारों मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं और मौलवियों ने हिस्सा लिया था. घोषणापत्र में कहा गया था जिसमें 'इस्लाम ऐसा धर्म है, जिसमें सभी के प्रति दया-दृष्टि रखी जाती है. इस्लाम सभी तरह की हिंसा, आतंकवाद और अत्याचार की कड़ी आलोचना करता है. इस्लाम में अत्याचार, धोखा, दंगा और हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है.' घोषणापत्र में मुस्लिम विद्वानों से अपील की गई थी कि वे इस्लाम विरोधी और राष्ट्र विरोधी शक्तियों के प्रभाव में न आएँ. दारुल-उलूम के प्रमुख प्रशासक मौलाना मरग़ूब-उर-रहमान ने कहा कि हमारा आतंकवाद और आतंकवादियों से कोई लेना-देना नहीं है. 1866 में स्थापित दारुल-उलूम भारत का सबसे पुराना और दुनिया के सबसे बड़े मदरसों में से एक है. | इससे जुड़ी ख़बरें देवबंद में 'आतंकवाद' के ख़िलाफ़ घोषणापत्र25 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस फिर उभरने लगे हैं सांप्रदायिक मुद्दे06 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस कट्टरपंथियों की कोई शर्त मंज़ूर नहीं05 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस इस्लामाबाद की लाल मस्जिद का महत्व04 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में मदरसे के ख़िलाफ़ प्रदर्शन05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय नहीं'05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस तालेबान की शैली की एक मुहिम28 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस केंद्रीय मदरसा बोर्ड के गठन की मांग03 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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