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लखनऊ की महिला 'बिजली मिस्त्री' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब भी हमारे घर पर किसी बिजली के उपकरण में नुक्स आता है तो आम तौर पर हम इलेक्ट्रीशियन यानी बिजली के मिस्त्री को बुलाते हैं. लेकिन हम आपको बताते हैं एक महिला बिजली मिस्त्री के बारे में. महिला बिजली मिस्त्री सुनने में थोड़ा हैरान तो करता है लेकिन लखनऊ की प्रेमवती सोनकर ये काम पिछले पैंतीस वर्षों से कर रही हैं. बासठ साल की प्रेमवती को बचपन से बिजली की झालरें और उपकरण आकर्षित करते थे. उनकी भी इच्छा होती थी कि काश वो ये काम सीख पातीं. नैनीताल की रहने वाली प्रेमवती की शादी हुई लखनऊ के प्यारे लाल से जिन्हें बिजली के काम की अच्छी खासी जानकारी थी. प्यारे लाल लखनऊ में ही जल संस्थान में कर्मचारी थे. हौसले की जंग शादी के बाद प्रेमवती दिन भर घर पर खाली बैठी रहती थीं. घर के आर्थिक हालात भी कुछ ठीक नहीं थे. ऐसे में प्रेमवती ने अपने पति को बिजली के उपकरणों की मरम्मत करने का सुझाव दिया. इस तरह उन्होंने एक दुकान खोल ली और प्रेमवती खाली समय में उनका हाथ बंटाने लगीं. पति के हौसले से प्रेमवती के बचपन का शौक कब हुनर में बदल गया इसका एहसास उन्हें ख़ुद भी न हुआ. रोटी बेलने वाले हाथ जल्दी ही मोटर की वाइंडिंग और बिजली के दूसरे साज़ो-सामान बनाने लग गए. अब तो उन्हें बिजली के करंट का झटका और रोटी बेलते वक्त हाथ का जलना एक ही जैसा लगता है. प्रेमवती का सफ़र खास बात ये है कि प्रेमवती बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नहीं हैं. बिजली की झालर, सजावट के बोर्ड, पंखे-कूलर की मरम्मत और मोटर वाइंडिंग का काम वो पूरी दक्षता से कर लेती हैं. लेकिन प्रेमवती का ये सफ़र इतना आसान भी नहीं रहा है. ये बताते हुए प्रेमवती भावुक हो जाती हैं. प्रेमवती कहती हैं, “ दुकान पर एक महिला का बैठना किसी को भी पसंद नहीं आता था. लेकिन पति के सहयोग से धीरे-धीरे सब ठीक हो गया.” वो कहती हैं, “ मेरा हाथ मेरा भगवान है, महिलाओं को अगर आगे आना है तो उन्हें अपनी मदद ख़ुद करनी होगी. अगर समाज के सभी लोगों के पास कुछ न कुछ हुनर रहेगा तो देश में होने वाले अपराध अपने आप कम हो जायेंगे.” ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ प्रेमवती का दर्शन भर है. बल्कि वो लगभग तीन सौ लोगों को ये काम सिखा भी चुकी हैं. खास बात ये है कि इसके लिए उन्होंने किसी तरह की कोई फ़ीस भी नहीं ली है. प्रेमवती बताती हैं, “जाड़े में कमाई कम होती है लेकिन गर्मियों में काम ज्यादा आता है और औसतन तीन से चार हज़ार रुपए की कमाई हो जाती है.” हुनर आठ साल पहले पति की मौत के बाद भी उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया और अपने काम को बदस्तूर जारी रखा है. चार बेटों और चार बेटियों की माँ प्रेमवती ने अपने सारे बच्चों को ये हुनर सिखा रखा है.
लखनऊ की पुलिस लाइन में काम करने वाले भवानी प्रसाद पिछले दो साल से अपने बिजली के सामान की मरम्मत यहाँ करा रहे हैं. भवानी प्रसाद कहते हैं, ''प्रेमवती की दुकान पर बिजली के उपकरण बेहद ही वाजिब कीमत में सही हो जाते हैं.'' लेकिन इतने साल गुज़र जाने के बाद भी प्रेमवती की दुकान पर कोई बोर्ड नहीं लगा है. इस पर प्रेमवती कहती हैं, “ इतने पैसे कभी बचे नहीं कि बोर्ड बनवा सकें, लेकिन उनका काम ही उनकी पब्लिसिटी कर देता है.” ज़िंदगी को एक संघर्ष मानने वाली प्रेमवती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से बड़ी उम्मीदें हैं. आने वाले वक्त में प्रेमवती लड़कियों के लिए एक बिजली ट्रेनिंग सेंटर खोलना चाहती हैं. उनका कहना है कि पैसा आते ही वो ये काम सबसे पहले करेंगी. प्रेमवती की कहानी ये साफ़ बयां करती है कि इंसान किसी भी काम को अंजाम दे सकता है, बस ज़रूरत है जज़्बे और थोड़ी सी हौसला अफ़ज़ाई की. |
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