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गुरुवार, 31 जनवरी, 2008 को 13:16 GMT तक के समाचार
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गोड्से और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ!

महात्मा गांधी
महात्मा गाँधी के सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर नई बहस छिड़ गई है
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सिद्धांतकार देवेंद्र स्वरूप ने कहा है की महात्मा गांधी की हत्या के पीछे नाथूराम गोडसे का कोई निजी स्वार्थ नहीं था.

उन्होंने बीबीसी से एक बातचीत में कहा की गोडसे के इस काम से हिंदू समाज को नुक़सान पहुँचा क्योंकि मृत गांधी जीवित गांधी से ज़्यादा ताक़तवर साबित हुए.

देवेंद्र स्वरूप ने कहा, "यह बात माननी पड़ेगी की गोडसे ने वो काम निःस्वार्थ भाव से किया. उसमें उसका कोई निजी स्वार्थ नही था लेकिन अगर वो यह समझता था कि गांधीजी इतिहास को ग़लत रास्ते पर ले जा रहे थे और उनकी हत्या करके वो इतिहास को सही रास्ते पर ले आएगा तो वो ग़लत था."

महात्मा गाँधी की हत्या के साठ साल बाद भी हिंदुत्ववादी संगठनों और गांधी के विचारों का द्वंद्व ख़त्म नही हुआ है.

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा में हिस्सा लेने जा रहे महात्मा गाँधी पर नाथूराम गोड्से ने गोलियाँ चला दीं.

बाद में मुकदमें की सुनवाई के दौरान गोड्से ने गांधी को मुसलमानों के तुष्टिकरण का ज़िम्मेदार ठहराया था.

गोड्से महाराष्ट्र का चित्तापावन ब्राहमण था जो पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक था लेकिन आरएसएस का कहना है कि उसने संघ पर निस्तेज होने का आरोप लगाते हुए संगठन छोड़ दिया था.

गोड्से की प्रतिबद्धता

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गाँधी ने बीबीसी से कहा कि गोड्से को आरएसएस ने इस्तेमाल करके उसी तरह छोड़ दिया जैसे कोई संगठन हथियार के इस्तेमाल के बाद उसे फेंक देता है.

महात्मा गाँधी

गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सरकार ने पाबंदी लगा दी थी और सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर सहित आरएसएस के तमाम नेताओं को जेल में बंद कर दिया था.

बाद में संघ पर से पाबंदी हटा ली गई लेकिन गोड्से को लेकर हिंदुत्ववादी संगठनों में हमेशा असमंजस की स्थिति बनी रही.

देवेंद्र स्वरूप ही नही बल्कि बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक प्रकाश शर्मा ने भी कहा है कि गांधीजी कि हत्या के पीछे गोड्से की कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी.

बीबीसी से बात करते हुए प्रकाश शर्मा ने कहा, "नाथूराम गोड्से के दिल में देश को लेकर पीड़ा थी और उन्होंने उस समय जो उचित समझा वो ही किया."

गुजरात में फरवरी 2002 में भड़के मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान भी संघ परिवार को गांधी के अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता के विचारों से मुश्किल हुई.

उस दौरान विश्व हिंदू परिषद् के महामंत्री प्रवीण तोगडिया ने एक आम सभा में कहा था, "इस देश में गांधी की विचारधारा चल रही है. हमने 28 तारीख़ को गांधी को अपने घरों में बंद कर दिया. तुम गजनी को छोड़ दो, हम गाँधी को छोड़ देंगे. जब तक दुनिया में गांधी का विचार चल रहा है, मुसलमानों के सामने घुटना टेकने का विचार चल रहा है तब तक आतंकवाद से नहीं निबटा जा सकता."

अलबत्ता जब आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो हम इससे सहमत नही हैं."

आरएसएस ने बाद में गांधी और अंबेडकर का नाम प्रातःस्मरणीय लोगों में शामिल किया.

घोषित तौर पर संघ परिवार गोड्से को अस्वीकार करता है लेकिन अब भी उसके काम को संघ के लोग निःस्वार्थ बताते हैं.

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