BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
रविवार, 02 दिसंबर, 2007 को 14:24 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
जल के बल से जूझती विशाल जनसंख्या

नाव
बांग्लादेश में तूफ़ान और चक्रवात आम बात है
बांग्लादेश में दो चीज़ें क़ाबू से बाहर हैं..आबादी और पानी.

देश के आठ प्रतिशत हिस्से में पानी है जो बाढ़ के समय तीस से चालीस प्रतिशत ज़मीन को डुबो देता है.

ढाका शहर की आबादी एक करोड़ से अधिक है और पूरे बांग्लादेश की आबादी है क़रीब सोलह करोड़. इतना ही नहीं आबादी अभी भी प्रति वर्ष चार प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.

बढ़ती आबादी का असर पर्यावरण पर ज़रुर पड़ता है लेकिन फिलहाल जलवायु परिवर्तन के जो असर बांग्लादेश के तटीय इलाक़ों में स्पष्ट दिखते हैं उसके लिए बांग्लादेश की ज़िम्मेदारी कम बनती है.

कहा जाता है कि अगर आज की तारीख में बांग्लादेश के सारे लोग सांस लेना तक बंद कर दें तो भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से ये देश बच नहीं पाएगा.

निचली ज़मीन पर बसे इस देश के लोगों के लिए दिन-प्रतिदिन की समस्याएं इतनी अधिक हैं कि उन्हें इस बात से शायद ही कोई फर्क पड़ता है कि देश में कब लोकतांत्रिक सरकार होती है और कब मिलिट्री का शासन.

आंधी, तूफ़ान और चक्रवात के झंझावत में फंसे यहां के लोगों का जीवन मौसम से ही तय होता है.

सुंदरबन के इलाक़ों में जाइए तो जीवन ज्वार भाटे के हिसाब से तय होता है.

मछली कब पकड़नी है, नदी में कब जाना है, किस दिशा में जाना है, कब जाना है कैसे जाना है, जहाज़ को लंगर कब डालना है सब कुछ ज्वार भाटे के समय के आधार पर तय होता है.

जब बाढ़ आती है तो कहीं ज़मीन डूब जाती है तो कहीं नई ज़मीनें निकल आती हैं.

जहां ज़मीन निकली वहां लोग पलायन कर के चले जाते हैं और इन ज़मीनों पर कब्जा़ करने के लिए खूनी संघर्ष आम बात है.

संघर्ष में मौतें होती हैं लेकिन ये मौतें जीवन संघर्ष की मौतें है जिसकी सुध कोई नहीं लेता.

जब आप नौका से ऐसे ही किसी टापू पर उतरते हैं तो पता चलता है कि वहां रहने वाले किसी और जगह से आए हैं और जब ये ज़मीन डूबेगी तो कहीं और चले जाएंगे. यानी मौसम ने इन्हें नियमित रूप से शरणार्थी बना कर छोड़ दिया है.

बांग्लादेश में मौतें अब सिर्फ आकड़े बन कर रह गई हैं. पिछले हफ्ते तूफ़ान में दो हज़ार लोग मरे, इस साल बाढ़ में तीन सौ लोग मरे. साल में तीन से चार बार तूफ़ान आता है. सत्तर के दशक में आए तूफ़ान में लाखों लोग मारे गए थे.

देश में सरकारी स्तर पर आपदा प्रबंधन कितना संभव है कहना मुश्किल है क्योंकि यहां का सारा काम गैर सरकारी संगठन ही करते हैं.

सबसे बड़ा बैंक, सबसे बेहतर मोबाइल नेटवर्क, सबसे अच्छी दुकानें, स्वच्छ पानी मुहैया करना, यहाँ तक कि यातायात से जुड़े कुछ काम में भी गैर सरकारी संगठनों का हाथ है.

यही लगता है कि बांग्लादेश को या तो मौसम चला रहा है या फिर गैर सरकारी संगठन.

सुंदरवनसुंदरबन के मुहाने पर...
नष्ट होते सुंदरी पेड़ों के बीच से बीबीसी संवाददाता सुशील झा की डायरी.
बांग्लादेश नावएक गाँव की दास्तां
बांग्लादेश में नाव से एक गाँव पहुँचे हमारे संवाददाता सुशील झा की रिपोर्ट.
नाव से दौरान जाने कितने कीड़े
बांग्लादेश में नाव से दौरा कर रहे हमारे संवाददाता सुशील झा की डायरी.
बाघआदमखोर का आतंक
सुंदरबन के आदमखोर बाघों के आतंक से परेशान एक गाँव की कहानी.
एक यौनकर्मीक़ब्र की तलाश में
बांग्लादेश में कुछ यौनकर्मियों को क़ब्र के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है.
सुंदरवनसुंदरबन की ख़ूबसूरती..
सुंदरबन की ख़ूबसूरती की तुलना शायद असंभव है. सुशील झा की डायरी.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>