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गुरुवार, 29 नवंबर, 2007 को 09:49 GMT तक के समाचार
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कर्नाटक विधानसभा भंग
कर्नाटक विधानसभा
कर्नाटक में भाजपा और जनता दल(एस) के बीच सरकार गठन की कवायद बेहद नाटकीय रही थी.
कर्नाटक में गुरूवार को विधानसभा भंग कर दी गई और इसी के साथ राज्य में नए सिरे से चुनाव कराने का रास्ता साफ़ हो गया है.

विधानसभा भंग होने के साथ राज्य में कई महीनों से चल रही सरकार बनाने की जोड़तोड़ का अंत हो गया है.

राष्ट्रपति भवन के अनुसार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बाद बुधवार को कर्नाटक विधानसभा भंग करने संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर किए.

कर्नाटक राजभवन के सूत्रों के अनुसार राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर और उनके तीन सलाहकार गुरूवार से ही कार्यभार संभाल लेंगें.

कर्नाटक विधानसभा अभी तक निलंबित अवस्था में थी. इससे पहले ससंद के दोनों सदनों ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने को मंजूरी प्रदान कर दी थी.

गौरतलब है कि सिर्फ़ सात दिनों तक मुख्यमंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी नेता बी एस एदियुरप्पा 19 नवंबर को विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए थे और उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था.

इसके बाद अगले ही दिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था.

नाटकीय घटनाक्रम

कर्नाटक में पिछले दो महीनों में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा है. इसके साथ ही सत्ता हस्तांतरण को लेकर भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस के बीच चल रहा राजनीतिक नाटक भी ख़त्म हो गया है.

भाजपा और जेडीएस के बीच पिछले साल के शुरू में हुए सत्ता साझीदारी समझौते के तहत जेडीएस नेता कुमारस्वामी को 20 महीनों के लिए मुख्यमंत्री बनाया गया था.

इस वर्ष तीन अक्तूबर को यह अवधि ख़त्म होने पर जनता दल (एस) ने सत्ता हस्तांतरण से इनकार कर दिया था जिसके बाद भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और अल्पमत में आने के बाद एचडी कुमारस्वामी ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

तब राज्यपाल की सिफ़ारिश पर कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाया गया लेकिन तेज़ी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में जेडीएस ने अचानक रूख़ बदला और जेडीएस ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला किया.

आख़िरकार राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और 12 नवंबर को भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. ये किसी दक्षिणी राज्य में भाजपा की पहली सरकार थी.

लेकिन जनता दल (एस) ने एक बार फिर पलटी मारी और 19 नवंबर को जब येदियुरप्पा को विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध करना था, उससे कुछ ही घंटे पहले पार्टी ने व्हिप जारी कर अपने विधायकों को सरकार का समर्थन न करने को कहा.

इसके बाद येदियुरप्पा ने सदन में विश्वास मत का सामना किए बिना राज्यपाल को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया था.

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