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बाघ से लड़ने वाले गफ़्फ़ार की आपबीती | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुंदरबन के जंगलों में पर्यटकों को भले ही बाघ न दिखता हो लेकिन जंगल के किनारे बसे कई गांवों को आदमखोर बाघों का कहर झेलना पड़ता है. बाघ के सामने आने वाले कुछ ही लोग बच पाते हैं लेकिन अब्दुल गफ्फ़ार उन लोगों में है जिन्होंने न केवल बाघ से लड़ाई की बल्कि उसे भगाने में भी सफल रहे. बीबीसी की टीम जब अब्दुल के गांव पहुंची तो वो अपनी दुकान में थे. अब्दुल डीवीडी और सीडी की दुकान चलाते हैं. सुंदरबन में बीबीसी संवाददाता सुशील झा को उन्होंने बाघ से अपनी लड़ाई की कहानी विस्तार से सुनाई. "मेरे माथे पर ये जो निशान है वो बाघ के पंजे से लगा था. असल में बाघ ने मेरे भतीजे पर हमला किया था. उसे बचाने के लिए मैं कूदा तो बाघ क सिर मेरे पेट के नीचे था. उसने अपने बाएं पंजे से मेरे सर पर हमला किया. उसी से यहां और हाथ में चोट लगी. मेरा हाथ बाघ के मुंह में था तब तक मेरे भाई ने पीछे से बाघ को मारना शुरु किया. मारने पर बाघ पीछे हटने लगा लेकिन उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और मुझे अपने साथ घसीटने लगा. मैंने हाथ छुड़ाने की कोशिश की और दूसरे हाथ से बाघ को मारता रहा.. बहुत कोशिश करने पर हाथ छूट गया तो मैं दौड़ कर भागा और नाव पर आ गया. बाघ हमें कुछ देर तक देखता रहा. मुझे याद है कि बाघ का चेहरा कितना खूंखार था... कितना डरावना.. लेकिन जब मैं उस पर कूदा था तो उसका शरीर इतना मुलायम लगा था कि विश्वास नहीं होता कि ये इतना ख़तरनाक होता है. फिर हम नाव के साथ वापस आने लगे. मेरे भाई ने मेरे शरीर से बहता खून रोकने की कोशिश की और हम अस्पताल चले गए. असल में अल्लाह ने बचा लिया. हमने थोड़ी बहादुरी भी दिखाई. आम तौर पर बाघ के मुंह से कोई नहीं बचता है. अब तो हमारे गांव में कई बाघ हमला करते हैं और रात में कोई सो नहीं पाता है. वो हमारे जानवरों को ले जाते हैं. हम तो आग जलाकर रात- रात भर जागते हैं. लोग रात को अकेले नहीं निकलते हैं. हमें बाघ से बहुत डर लगता है. रमज़ान के समय एक बाघ मेरे घर के पास आ गया था और मेरे कुत्ते को ले जाने की कोशिश कर रहा था. वो हमारे पड़ोसी के घर में बाड़ तोड़कर घुस आया था. हमने टॉर्च जलाकर देखा तो पाया कि बाघ ने कुत्ते को मार दिया है और मरा कुत्ता उसके मुंह में था. हमने हल्ला गुल्ला किया तो वन अधिकारी राइफलों के साथ आए. जब उन्होंने गोलियां चलाई तब कहीं जाकर बाघ भागा. इसी बाज़ार में इस सड़क तक आया था बाघ. अब तो हर दिन बाघ आता है. परसों भी यहां बाघ आया था. रात में मदरसा के कुछ लोग बाहर आए तो पाया कि वो रास्ते में है और लोगों की तरफ देख रहा है. फिर उन लोगों ने हल्ला किया आग जलाई तब वो आराम से चहलकदमी करता हुआ जंगल की तरफ चला गया". | इससे जुड़ी ख़बरें बाघों को बचाने की कवायद16 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस बाघ मारने का अनोखा 'ग़ैरक़ानूनी' उत्सव29 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस लगातार घट रही है बाघों की संख्या24 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'बाघों के शिकार पर कोर्ट की हिदायत'26 मई, 2007 | भारत और पड़ोस बाघों की चौकसी करेंगे पूर्व सैनिक03 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस आदमखोर बाघों का आंतक09 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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