|
मेहनत का मोल पहले से बेहतर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहारी मज़दूरों को अपने साथ ले जाने के लिए इन दिनों कई राज्यों के उद्यमी गाँवों में डेरा डाले हुए हैं और 'परदेस' जाने के लिए मोटी रक़म एडवांस दे रहे हैं. काम पाने के लिए दलालों के चक्कर काटने वाले ये मज़दूर इस नए रुझान के बाद न सिर्फ़ बेहतर मज़दूरी लेने की स्थिति में हैं, बल्कि काम के घंटे और सेवा शर्तें भी पहले से तय कर रहे हैं. हरियाणा, पंजाब, गुजरात, असम और दिल्ली समेत अनेक राज्यों के उद्यमी जिन पर अक्सर काम करवा कर पूरी मज़दूरी नहीं देने के आरोप लगते थे, इन दिनों लाखों रुपए लिए बिहार के गाँवों में घूम-घूम कर मज़दूरों को पेशगी बाँट रहे हैं. ये उद्यमी मज़दूरों को काम पर रखने के लिए स्थानीय दलालों की मदद लेते हैं. यह रुझान पिछले दो-तीन वर्षों से काफ़ी बढ़ता दिख रहा है. जिसके नतीजे में पिछले एक साल में मज़दूरी की दरों में तीस प्रतिशत तक इज़ाफ़ा हुआ है. रुझान बिहार के समाजशास्त्रियों का मानना है कि धीरे-धीरे संगठित और अवसरों के पारखी होते जा रहे बिहारी मज़दूरों ने अपने महत्व को अब पहचान लिया है और यह नया रुझान उसी का नतीजा है. उत्तर बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, पूर्वी तथा पश्चिमी एसोसिएशन ऑफ लेबर इकोनॉमी के आंकड़ों के अनुसार चंपारण, मधुबनी, दरभंगा के अलावा नालंदा, बेगूसराय और शेखपुरा समेत अन्य कई ज़िलों के लगभग आठ लाख म़ज़दूर हर वर्ष काम के लिए अन्य राज्यों में चले जाते हैं. शेखपुरा का केवटी गाँव उन सैकड़ों गाँवों में से एक है जिन गाँवों के आधे से अधिक लोग मज़दूरी के लिए दूसरे राज्यों के लिए कूच कर जाते हैं. दशहरा और दीपावली के ख़त्म होने के बाद से बसों की छतों पर सवार ये मज़दूर सैकड़ों की ज़मात में कूच करते नज़र आ रहे हैं. ये सिलसिला छठ के बाद तक जारी रहेगा. पेशगी शेखपुरा के दलित बहुल गाँव केवटी में रहने वाले मज़दूरों के दलाल दिनेश चौधरी इस मौसम के लिए 80 मज़दूरों को ले जाने वाले हैं और उन्होंने पाँच लाख रुपए का एडवांस मज़दूरों को दे चुके हैं.
दिनेश बताते हैं, "इस बार हमने ईंट-भट्टा मज़दूरों के लिए एक हज़ार ईंटें पाथने के बदले 184 रुपए मज़दूरी तय की है. पिछले साल इस काम के लिए उन्हें सिर्फ़ 160 रुपए मिले थे." केवटी से हर साल तीन सौ से अधिक पुरुष और महिलाएँ हरियाणा, पंजाब और गुजरात के लिए चले जाते हैं. दिनेश कहते हैं, "पहले यहाँ के मजदूर एजेंटों के माध्यम से नहीं जाते थे इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए कोई संगठित आवाज़ नहीं थी, अब वह बात नहीं रही." रोहतक स्थित वैश्याल ईंट-भट्टा लिमिटेड के प्रबंधक दलजीत सिंह मज़दूरों के लिए इन दिनों बिहार के गाँव-गाँव में घूम रहे हैं. वे मानते हैं कि उनके यहाँ के कुछ उद्यमी मज़दूरों का शोषण करते रहे हैं जिसके कारण अब मज़दूरों की क़िल्लत हो गई है. वे कहते हैं, "अगर हम यहाँ के मज़दूरों को पेशगी देकर नहीं ले जाएँ तो हमारा काम ठप हो जाएगा." पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर आरएन शर्मा ने बिहार से मज़दूरों के पलायन पर काफ़ी काम किया है. वह मज़दूरों तथा उनकी माँग के बारे में कहते हैं, "बिहारी मज़दूर अपने महत्व को अब अच्छी तरह समझने लगे हैं और संगठित हुए हैं. मज़दूरी के मामले में वह अब मोलतोल करने की स्थिति में आ गए हैं और ये सब उसी का परिणाम है." | इससे जुड़ी ख़बरें बिहार बंद का आंशिक असर02 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस पत्रकारों पर हमले के विरोध में बिहार बंद01 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस झारखंड नरसंहार में नामज़द प्राथमिकी29 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस लालू ने नीतीश पर निशाना साधा28 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस समाज को बाँटने की कोशिश तो नहीं....15 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस लुधियाना में धमाका, छह की मौत14 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'बिहार में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं'11 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||