BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 03 नवंबर, 2007 को 16:55 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
खाड़ी के देशों में मज़दूरों के टूटते सपने

दुबई के एक घर में रह रहे मज़दूर (फ़ाइल फ़ोटो)
दुबई में मज़दूर काफ़ी ख़राब हालत में रहते हैं, एक कमरे में 10-15 मज़दूरों को रहना पड़ता है.
भारत से लाखों की तादाद में लोग खाड़ी देशों में मज़दूरी करने जाते हैं. आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने लिए... लेकिन वहाँ उन्हें लगभग अमानवीय स्थितियों में रहना पड़ता है. कई बार ये मज़दूर दलालों के चंगुल में फंस कर अपना सब कुछ गवां बैठते हैं.

दुबई जैसे देशों में सरकार ने विशेष आर्थिक ज़ोन बना रखे हैं, जहाँ कारख़ानेदारों पर श्रम क़ानूनों को मानने का कोई दबाव नहीं होता. हड़ताल करने का अधिकार उन्हें है नहीं. इन्हीं परिस्थितियों में 28 अक्तूबर को दुबई के हज़ारों मज़दूरों ने हड़ताल कर दी थी. सरकार ने उन पर आपराधिक मुक़दमें चलाने का फ़ैसला किया है.

दुबई के चार घरों में खाना बनाकर, कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे आंध्र प्रदेश के शंकर ने बताया, “एक लाख रुपये लोन लेकर यहां आया था. यहां आकर एजेंट के कारण फंस गया. किसी तरह दो-तीन महीने बाद काम मिला.जिससे 15 सौ रुपये कमा लेता हूं.”

शंकर ने बताया, “यहां हम एक कमरे में दस से पंद्रह लोग रहते हैं, जिसके लिए हर आदमी को चार सौ रुपये किराया देना पड़ता है.”

मज़दूरों का सपना

संयुक्त अरब अमीरात में काम कर रहे हज़ारों भारतीयों की यही कहानी है. कहानी इसलिए भी दर्दनाक हो जाती है, क्योंकि इनमे से ज्यादातर ग़रीबी की मार झेलने वाले ऐसे लोग हैं जो ज़मीन-ज़ायदाद गिरवी रखकर यहां आए हैं. एक स्वर्णिम भविष्य के सपने संजोए. पर क्या उनका सपना एक छलावा है?

दुबई में कई वर्षों से कांट्रैक्टर का काम करने वाले वक़ी अज़हरी कहते हैं, “ भारत से लोग यहां यह सोचकर आते हैं कि यहां पैसों का पेड़ लगा है, लेकिन ऐसा नहीं है.”

उन्होंने कहा, “यहां आने वाले लोगों को थोड़ा प्रोफ़ेशनल होना पड़ेगा. यहां काम में बहानेबाज़ी नहीं चलती, अगर आठ घंटे की शिफ़्ट है तो पूरे आठ घंटे आपको काम करना पड़ेगा.”

यहां आने वाले लोगों को थोड़ा प्रोफ़ेशनल होना पड़ेगा. यहां काम में बहानेबाज़ी नहीं चलती, अगर आठ घंटे की शिफ़्ट है तो पूरे आठ घंटे आपको काम करना पड़ेगा.
वक़ी अज़हर, कांट्रैक्टर दुबई

उन्होंने बताया, “ यहां का मौसम भी अगल है. गर्मियों में यहां का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. ऐसे मौसम में ही मज़दूरों को काम करना पड़ता है. हम उनका ख़्याल भी रखते हैं.”

उन्होंने कहा, “ यहां आने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि हम वहां काम करके पैसा कमाने जा रहे हैं.”

28 अक्तूबर को दुबई के करीब चार हजार श्रमिक हड़ताल पर चले गए और चूंकि यहां हड़ताल ग़ैर कानूनी है, इसलिए उन्हें हिरासत में ले लिया गया.

दुनिया भर ने इनकी आवाज़ सुनी. इन देशों में कामकाज की स्थिति पर सभी का ध्यान गया.

श्रम कानूनों की कमी

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 10 लाख से ज़्यादा भारतीय काम करते हैं. कुछ शंकर की तरह घरों में काम करके तो कुछ जो हुनरमंद यहां के निर्माण उद्योग में काम कर रहे हैं. इनकी तनख़्वाह छह सौ से पंद्रह सौ दिरहम है, जो नाकाफ़ी है.

दुबई में काम करने वाले एक तकनीशियन कहते हैं., “ यहां काम करने वाले मज़दूरों को पांच सौ से साढ़े छह सौ दिरहम तक की तनख़्वाह मिलती है. यहां महंगाई भी काफ़ी अधिक हैं.

यहां आने वाले मज़दूर किसी तरह से 250 से 300 दिरहम ही बचा पाते हैं, यानि भारतीय रुपये में तीन-चार हज़ार.

महंगाई बढ़ रही है और डालर की साख घट रही है. जिससे रुपये की तुलना में दिरहम का अवमूल्यन हो गया है, तो यहां रह रहे लोगों की तक़लीफ़ें बढ़ रही हैं.

के कुमार एक गैर सरकारी संस्था चलाते हैं. वह यूएई में रह रहे भारतीयों के बीच काम करते हैं. वह कहते हैं, यहां मुद्दा केवल जीवित रहने का नहीं है, क्योंकि जो भारतीय यहां काम करने आते हैं, वे बचत करना चाहते हैं.

दुबई में काम कर रहे मज़दूर
खाड़ी देशों में जाने वाले मज़दूरों को काफी विपरीत पिरस्थितियों में काम करना पड़ता है

के कुमार कहते हैं, “ यहां आने वाले भारतीय केवल जीने और खाने के लिए पैसा कमाने नहीं आते हैं, वे कुछ सपने लेकर यहां आते हैं. जिन्हें वह पैसे कमा कर पूरा करना चाहते हैं, लेकिन यहां उन्हें जितना पैसा मिलता है, वह उसे पूरा करने के लिए काफ़ी नहीं होता है.”

दुबई की चमकती ऊंची इमारतों के पीछे बड़ी संख्या में भारतीयों का खून पसीना है. मानवाधिकार संगठन लगातार खाड़ी के देशों के ख़राब मानवाधिकार रिकार्ड पर आवाज़ उठाते रहते हैं.

मीडिया में भी अक्सर मज़दूरों के साथ दुर्व्यवहार होने की ख़बरें आती रहती हैं.

यूएई सरकार श्रम कानूनों में सुधार की कोशिश कर रही है. वीसा नियमों को कड़ा किया गया है.

घूमने आए लोगों के काम पर लग जाने, भारत में गलत कांट्रैक्टरों के हाथ फंसने जैसी घटनाएं कम हो रही है.

भाषा की समस्या

कुछ शिकायतें यूएई पहुंच कर किए गए कांट्रैक्ट की भी हैं. ये अरबी में लिखे होते हैं. दस्तख़त करने वालो पता नहीं होता कि उन्होंने किस दस्तावेज़ पर दस्तख़त किए हैं, वह क्या कहता है.

आबू धाबी में भारत के राजदूत तलमीज़ अहमद कहते हैं, “यहां आने के बाद लोग कहते हैं कि हमने अरबी में लिखे कांट्रैक्ट को साइन किया है. उस पर क्या लिखा था मैं नहीं जानता.”

दुबई में रह रहे भारतीय मज़दूर(फ़ाइल फ़ोटो)
दुबई में काम करने वाले मज़दूरों को औसतन पांच से साढ़े छह सौ दिरहम तनख़्वाह मिलती है.

उन्होंने कहा, मै इस इस तरह की समस्या का दूर करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि केवल एक कांट्रैक्ट हो, जिसकी चार कॉपियां हों जो चार लोगों के पास हों.”

संयुक्त अरब अमीरात के श्रम मंत्री इस बात को मानते हैं कि यहां काम करने वाले आधे लोग भारत के हैं, जो उनके देश के निर्माण में लगे हैं. भारतीय कामगारों के हितों की रक्षा के लिए वे कदम उठा रहे हैं.

भारत भी खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों का महत्व समझता है, क्योंकि ये लाखों डालर घर भेजते हैं.

सरकार की सख्ती

वक़ी अज़हर कहते हैं कि यहां अब हालात सुधर रहे हैं. यहां की सरकार भी कई क़दम उठा रही है.

उन्होंने कहा, “कांट्रैक्ट में धोखाधड़ी हम लोग नहीं करते हैं. ऐसा वे लोग करते हैं जो मज़दूरों से ही पैसा कमाने चाहते हैं. ये लोग ही कांट्रैक्ट की शर्तों को मज़दूरों से छिपाते हैं.”

उन्होंने बताया, पिछले चार सालों से ऐसे मामलों में कमी आई है. क्योंकि यहां का श्रम विभाग काफ़ी सख़्त हुआ है. अब केवल उन्हीं लोगों की वीज़ा दिया जाता है, जिनके पास वैध कांट्रैक्ट होता है.

भारत के प्रवासी भारतीय मंत्रालय ने भी संयुक्त अरब अमीरात सरकार से श्रमिक हितों पर बात की है.

आबू धाबी में भारत के राजदूत तलमीज़ अहमद कहते हैं कि श्रमिकों की समस्याएं दूर करने के लिए कई मुद्दों पर चर्चा हुई है.

उन्होंने कहा, “कांट्रैक्ट सिस्टम को दुरुस्त करना होगा. मज़दूरों की शिकायतों के लिए भी हमें चौकन्ना रहना होगा.”

उन्होंने कहा, “इस मामले में यूएई की सरकार को भी सहायता करना चाहिए और कंपनियों को भी इस मामले में थोड़ा सुधार लाना होगा.”

उन्होंने बताया कि, हम यूएई सरकार के साथ मिलकर सलाह देने का एक संयुक्त तंत्र बना रहे हैं. जिसमें भारतीय दूतावास और संयुक्त अरब अमीरात सरकार के अफ़सर इस तरह की शिकायत लेकर आने वाले लोगों से बात करेंगे.

 हम यूएई सरकार के साथ मिलकर सलाह देने का एक संयुक्त तंत्र बना रहे हैं. जिसमें भारतीय दूतावास और यूएई सरकार के अफ़सर इस तरह की शिकायत लेकर आने वाले लोगों से बात करेंगे.
तलमीज़ अहमद, भारत के राजदूत

तलमीज़ अहमद के अनुसार यहां वैध वीज़ा और कांट्रैक्ट के बिना आने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है. हम ऐसे लोगों की अधिक सहायता नहीं कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, “ मैं चाहता हूँ कि यहां कोई अवैध भारतीय न हो. इससे बचने के लिए प्रवासी भारतीय मंत्रालय ने छह महीने का एक अभियान शुरू किया है. इसके तहत लोगों को इस बात की सलाह दी जाएगी की वे बिना वैध कागज़ात के बाहर न जाएँ.”

इसका मतलब यह हुआ कि पैसे कमाने विदेश जा रहे लोग अगर आंख खोलकर, जांच पड़ताल कर जाएं. जिससे उन्हें विदेशी धरती पर तकलीफ़ों का सामना न करना पड़े.

वहीं भारत सरकार को भी चाहिए कि वह ग़लत कांट्रैक्टरों और दलालों को ब्लैकलिस्ट करे. वहां की सरकार पर बेहतर और मानवीय श्रमिक कानून लागू करने के लिए दबाव बढ़ाए.

इससे जुड़ी ख़बरें
नए ज़माने में भी ग़ुलामी का जीवन
26 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस
'बस अब घर वापस आ जाओ'
10 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस
चरमपंथी हमले में आठ मज़दूर मरे
12 जून, 2006 | भारत और पड़ोस
40 किलो चावल यानी 30 बरस मज़दूरी
28 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस
दुबई के मजबूर भारतीय मजदूर
10 फ़रवरी, 2005 | पहला पन्ना
दुबई में 159 मज़दूर हिरासत में
31 अक्तूबर, 2007 | पहला पन्ना
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>