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गुरुवार, 24 मई, 2007 को 14:58 GMT तक के समाचार
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असंगठित श्रमिकों के लिए विधेयक

असंगठित कामगार
मनमोहन सरकार ने अंसगठित क्षेत्र के मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा देने की पहल की है
भारतीय कैबिनेट ने 'असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए 'सामाजिक सुरक्षा विधेयक, 2007' को गुरूवार को मंज़ूरी दे दी है.

इससे असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे क़रीब चार करोड़ श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने में मदद मिलेगी.

सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने पत्रकारों को यह जानकारी देते हुए इस निर्णय को एक क्रांतिकारी क़दम बताया.

प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन इस विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा.

इसके तहत असंगठित क्षेत्र के क़रीब चार करोड़ श्रमिकों को जीवन बीमा, स्वास्थ्य और विकलांगता क्षेत्रों में सुरक्षा दी जाएगी.

सूचना मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सभी अधिसूचित कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करेगी.

परिषद यह भी सुनिश्चित करेगी कि पात्रता रखने वाले हर कामगार का पंजीकरण हो और उसे एक पहचान पत्र जारी किया जाए.

प्रस्तावित विधेयक के तहत 18 साल से अधिक उम्र के सभी कामगारों का पंजीकरण किया जाएगा.

पंजीकृत श्रमिकों को एक पहचान पत्र मिलेगा जो स्मार्ट कार्ड के रूप में होगा.

ज़िम्मेदारी

कैबिनेट के इस निर्णय के कुछ घंटों पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योग संगठनों की एक बैठक में भारतीय उद्योग से अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ समझने पर ज़ोर दिया था.

विधेयक को मानसून सत्र में संसद में पेश किया जाएगा

असंगठित मज़दूरों के लिए प्रस्तावित यह विधेयक अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट पर आधारित है जिसने केंद्र सरकार को पिछले साल अपनी सिफ़ारिशें सौपी थीं.

सेनगुप्ता समिति की सिफ़ारिशों के अनुसार श्रमिकों के लिए एक कोष स्थापित किया जाएगा.

इस कोष के लिए हर श्रमिक को प्रतिदिन एक रुपया, मालिक को एक रुपया और सरकार को भी एक रुपया देना होगा लेकिन ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले मज़दूरों के हिस्से का एक रुपया भी सरकार ही देगी.

विशेषज्ञों की समिति ने सरकार से कहा कि इस कार्यक्रम पर सकल घरेलू उत्पाद का दो फ़ीसदी यानी लगभग 82 हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा.

इस मुद्दे पर सरकार और वामपंथी पार्टियों में कई महीनों से चर्चा चल रही थी.

 विशेषज्ञों की समिति ने सरकार से कहा कि इस कार्यक्रम पर सकल घरेलू उत्पाद का दो फ़ीसदी यानी लगभग 82 हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा

वामपंथी पार्टियों का कहना था कि राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से अधिक उम्मीद नहीं लगाई जा सकती.

उनका कहना था कि वित्त मंत्रालय की तरफ से ज़रूरी धनराशि न मिल पाने की वजह से पिछले कुछ कार्यक्रमों में फ़ेरबदल करना पड़ा.

कैबिनेट के निर्णय का स्वागत करते हुए समाज सेविका और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित अरुणा रॉय ने बीबीसी के साथ बातचीत में इस पर चिंता जताई कि कैबिनेट के प्रस्तावित किए हुए इस विधेयक पर कोई चर्चा नहीं हुई.

उनका कहना था कि यूपीए सरकार ने शायद इस विधेयक को ज़ल्दबाज़ी में मंज़ूरी दी है क्योंकि 'ग़रीबों का एक बड़ा तबका' सरकार की नीतियों की वजह से दरकिनार हो रहा है.

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