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'ड्रेसकोड का पालन करो, नहीं तो सज़ा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अब चकाचक शर्ट, पैंट और टी-शर्ट, जींस जैसी कपड़ों में काम पर चले आना बिहार के नौकरशाहों के लिए नौकरी से हाथ धोने की वजह बन सकता है. पुरुष नौकरशाहों को अब अनिवार्य तौर पर हल्के रंग की शर्ट और पैंट पहनना होगा और महिला अधिकारियों को परपंरागत साड़ी और पूरी बाँह का ब्लाउज़ या सलवार सूट पहनना होगा. हाँ, अगर पुरुष अधिकारी चाहें तो वे धोती-कुर्ता पहन सकते हैं. वैसे तो बिहार सरकार का यह दिशा-निर्देश 1954 से ही लागू है लेकिन सोमवार से इस पर सख़्ती से पालन करने के निर्देश जारी किए गए हैं. राज्य के मुख्य सचिव एके चौधरी ने इस दिशा-निर्देश पर सख़्ती से अमल करने की बात कही और निर्देश न मानने वाले अधिकारियों को क़ानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहने की हिदायत भी दी. उन्होंने यह भी कहा कि इस निर्देश के ख़िलाफ़ जाने वाले अधिकारी की नौकरी भी जा सकती है. बिहार सरकार को ड्रेस कोड पर दिशा-निर्देश इसलिए जारी करना पड़ा क्योंकि पटना उच्च न्यायालय ने मुंगेर के एडीएम आरएन चौधरी पर अदालत में चेक शर्ट पहनने पर पाँच हज़ार रुपए का जुर्माना ठोंक दिया. एक अन्य अधिकारी एनके सिंह इसी दौरान टी-शर्ट में थे. अदालत ने उन्हें भी नहीं बख़्शा और उन्हें भी इतनी ही राशि का ज़ुर्माना अदा करने के लिए कहा गया. सख़्ती से पालन इधर ड्रेस कोड पर सख़्ती से पालन करने के सरकारी दिशा-निर्देश के बाद राज्य के नौकरशाह ख़ास तौर पर सतर्क हो गए हैं. लेकिन ऐसे भी अधिकारी हैं जो ड्रेस कोड पर अमल करना अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं लेकिन निजी तौर पर इसे अपनी इच्छाओं पर पहरा मानते हैं. एक अधिकारी का कहना है, " कपड़े के चयन का संबंध आदमी के व्यक्तित्व से है. ऐसी हालत में अगर कोई अधिकारी रंगीन कपड़े पसंद करता है तो वह मनोवैज्ञानिक तौर पर ख़ुद को अधिक ऊर्जावान और संतुष्ट महसूस करता है. ड्रेस कोड से बाँधने का असर उसकी कार्य क्षमता पर पड़ सकता है." मुज़फ़्फ़रपुर के काँटी में कार्यरत अधिकारी राजीव रंजन सिंह कहते हैं, '' ड्रेस कोड का पालन करना हमारे लिए एकदम ज़रुरी है लेकिन मैं निजी तौर पर यह मानता हूँ कि बदल-बदल कर अपनी पसंद के कपड़े पहनने से मैं ख़ुद को तरोताज़ा महसूस करता हूँ और एक निर्धारित तरह के कपड़े पहनने से नीरसता का अहसास होता है.'' उन्होंने आगे कहा, "ज़ाहिर है ड्रेस कोड का पालन करने से हमारी पसंद की बात महत्वहीन हो जाती है. लेकिन हम क़ायदे क़ानून से बँधे हैं इसलिए इसकी अवहेलना करने का सवाल ही नहीं होता.'' लेकिन मुज़फ़्फ़रपुर के जिलाधिकारी विनय कुमार पर ड्रेस कोड का सख़्ती से पालन करने के दिशा-निर्देशों का साफ़ प्रभाव दिखा. विनय कुमार का क्षेत्र बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है और राहत कामों के जायज़े के लिए उन्हें जगह-जगह पानी से भरे इलाक़ों में जाना पड़ता है. उन्होंने अपनी गाड़ी में बरसात के कपड़े और हवाई चप्पलें भी रख रखी हैं. लेकिन वो अपने कार्यालय में पहुँचते ही चप्पल और बरसाती कपड़े उतारकर औपचारिक ड्रेस पहनना नहीं भूलते. विनय कुमार कहते हैं, '' मैं इस मामले में कुछ भी नहीं कहना चाहता. हमें तो ड्रेस कोड का पालन करना है और मैं इसमें सहज महसूस करता हूँ.'' | इससे जुड़ी ख़बरें बिहार तबादलों पर विवाद गहराया02 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस मुख्यमंत्री को मसखरा समझने की सज़ा29 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस पुलिस की ज्यादती बनी मीडिया का 'मसाला'29 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस तहज़ीब के ज़रिए दोस्ती का पैग़ाम30 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस 'स्कर्ट' पर सानिया ने दिया जवाब17 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस मोटे लोगों के लिए ख़ास डिज़ाइनर कपड़े02 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस ख़्वाजा की दरगाह में ड्रेस कोड की तैयारी18 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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