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बेख़ौफ़, बिना नागा निकलता 'दीन दलित' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वो कभी स्कूल नहीं गए, पेशे से धोबी हैं. आमदनी बस गुज़ारे लायक. लेकिन लगन ऐसी कि पिछले 21 साल से बिना नागा अख़बार निकाल रहे हैं और वो भी हाथ से लिखा हुआ. यह शख्स हैं गौरीशंकर रजक. साठ साल से अधिक उम्र के गौरीशंकर भारत के पूर्वी राज्य झारखंड के दुमका के रहने वाले हैं. वो पिछले 21 साल से एक साप्ताहिक अख़बार निकाल रहे हैं. इसमें ग़रीबों पर अत्याचार और स्थानीय भ्रष्टाचार से संबंधित ख़बरें होती हैं. दीन दलित रजक के हाथ से लिखे इस चार पेज के हिंदी अख़बार का नाम है-दीन दलित. गौरीशंकर हाथ से अख़बार तैयार करने के बाद इसकी लगभग 100 फ़ोटोकॉपियां कराते हैं और फिर इन्हें ग्राहकों को बेच दिया जाता है. साथ ही सड़कों के किनारे और दुमका के बस स्टैंड पर इन्हें चिपका दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि 'दीन दलित' बस यूँ ही किसी छोटे-मोटे कस्बे का अख़बार हो, यह बाक़ायदा रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर्स फ़ॉर इंडिया यानी आरएनआई में पंजीकृत है. हालाँकि गौरीशंकर के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया आसान नहीं रही और जब उन्होंने देश के पहले दलित राष्ट्रपति केआर नारायणन को इस बारे में लिखा तभी उनका अख़बार पंजीकृत हो सका. असर अक्टूबर, 1986 में अपना पहला संस्करण निकालने के बाद 'दीन दलित' ने स्थानीय लोगों के जीवन पर गहरा असर डाला है. कई बार ऐसा हुआ जब अख़बार में ख़बर छपने के बाद प्रशासन की आँख खुली और लोगों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी. गौरीशंकर के अख़बार निकालने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. सामाजिक सुरक्षा योजना में अपना नाम जुड़वाने के लिए जब वो कुछ लोगों के साथ अधिकारियों के पास गए तो उनका अपमान किया गया. बस इसके बाद गौरीशंकर ने अख़बार निकालने का फ़ैसला कर लिया. गौरीशंकर कहते हैं, " मुझे बहुत बुरा लगा था. इस मुद्दे को प्रकाश में लाने के लिए मैं स्थानीय मीडिया में गया, लेकिन उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई." गुजर-बसर के लिए पूरे हफ़्ते कपड़े धोने के बाद गौरीशंकर रविवार के लिए ख़बरें चुनते हैं, संपादकीय पृष्ठ के लिए विषय चुनते हैं और लेखों पर शीर्षक लगाते हैं. रिपोर्टर भी अब तो गौरीशंकर के अख़बार में एक रिपोर्टर भी है. किराने की दुकान पर काम करने वाले 45 वर्षीय रविशंकर गुप्ता फुरसत में ख़बरें इकट्ठा करने का काम करते हैं. रविवार की सुबह अख़बार की 100 प्रतियां तैयार की जाती हैं. लगभग 50 प्रतियां नियमित ग्राहकों को बाँटी जाती हैं, 25 सरकारी विभागों में जाती हैं और बाकी को प्रमुख स्थानों पर दीवारों पर चिपका दिया जाता है. हालाँकि गौरीशंकर की पत्नी लक्ष्मी देवी की नज़र में इस काम की कोई कीमत नहीं है. वो कहती हैं, " वो हर हफ़्ते अपना समय और पैसा बर्बाद करते हैं. मुझे नहीं पता अख़बार निकालकर आखिर उन्हें मिलता क्या है." लेकिन सभी की सोच लक्ष्मी देवी की तरह नहीं है. रिक्शाचालक ध्रुव रवि कहते हैं कि गौरीशंकर का अख़बार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'जागरूक दलितों में धर्मांतरण ज़्यादा'27 मई, 2007 | भारत और पड़ोस दलितों-आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपनाया27 मई, 2007 | भारत और पड़ोस महँगी पड़ी संजय दत्त की झप्पी27 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस दलितों ने माँगा पूजा का अधिकार12 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस शशिनाथ झा हत्याकांड में शिबू सोरेन बरी22 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस झारखंड में 'गुरुजी' की पकड़ मज़बूत22 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस माओवादियों के बंद का झारखंड में असर26 जून, 2007 | भारत और पड़ोस यूरेनियम की खुदाई के विरोध में हड़ताल12 जून, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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