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आठ साल की क़ीमत आठ लाख रुपए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा में स्थानीय अदालत के अधिकारियों की लापरवाही की वजह से प्रताप नायक को रिहाई के बाद भी आठ साल जेल में बिताने पड़े. इसके लिए अदालत ने सोमवार को नायक को हर्जाने के तौर पर आठ लाख रुपए देने का आदेश दिया है. उड़ीसा के बौध ज़िले के एक गाँव के रहने वाले प्रताप नायक को ज़िंदगी के आठ साल जेल में सिर्फ़ इसलिए बिताने पड़े क्योंकि स्थानीय अदालत के अधिकारियों ने इस बारे में जेल अधिकारियों को सूचित नहीं किया था. उड़ीसा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 17 सितंबर तक यह हर्जाने की राशि अदा करने का आदेश दिया है. लापरवाही 1989 में ज़मीन के झगड़े की वजह से हुई एक हत्या के एक मामले में 13 वर्षीय प्रताप के अलावा पांच लोगों को जेल भेजा गया था. एक साल बाद बौध के सत्र न्यायालय ने सभी को ज़मानत पर छोड़ने का आदेश दिया था. लेकिन प्रताप के ग़रीब माता-पिता ज़मानत नहीं भर पाए जिससे प्रताप को जेल में ही रहना पड़ा. बाद में अक्टूबर 1994 को उड़ीसा हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी लोगों को बरी कर दिया था. हाईकोर्ट का यह आदेश ज़िला अदालत के पास तो पहुंचा. लेकिन जिला अदालत के अधिकारियों ने जेल अधिकारियों को इस बारे में सूचित नहीं किया क्योंकि उनके रिकॉर्ड के हिसाब से सभी अभियुक्त ज़मानत पर थे. उनके काग़ज़ात में प्रताप का कहीं अता-पता ही नहीं था जबकि वे जेल में बंद थे. लंबी क़ानूनी लड़ाई स्थानीय वकील संतोष कुमार पाढ़ी ने प्रताप के माता-पिता की गुहार के बाद मामले की छानबीन की तो यह जानकर भौंचक्के रह गए कि प्रताप को तो अदालत आठ साल पहले ही बरी कर चुकी है. वकील ने फ़ौरन हाईकोर्ट के आदेश की प्रति के साथ जिला अदालत में आवेदन किया तो अदालत ने अगले ही दिन प्रताप को रिहा करने का आदेश जारी कर दिया. इस तरह 14 साल जेल में काटने के बाद प्रताप 22 जनवरी,2003 को रिहा हुआ. लेकिन इतने साल जेल में गुजारने के बाद 27 साल की उम्र में प्रताप न बोल पाता था और न कुछ कर पाता था. डाक्टरों ने पाया कि वह निगेटिव सिजोफ्रेनिया का शिकार हो चुका है. प्रताप की दयनीय स्थिति जानने के बाद हाईकोर्ट के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रबीर दास ने प्रताप को हर्जाने की लड़ाई लड़ी. उनका तर्क था कि प्रताप के स्वतंत्रता के संवैधानिक आधार का हनन हुआ है. प्रबीर दास ने प्रताप को हर्जाना दिलाने के लिए दो साल की क़ानूनी लडा़ई लड़ी जो आखिरकार सोमवार को अपने अंजाम तक पहुंची और अदालत ने हर्जाने के तौर पर आठ लाख रुपए देने का आदेश दिया. फ़ैसले से खुश प्रबीर ने कहा,'' अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौलिक अधिकारों के मामले में अमीर और ग़रीब के बीच कोई फ़र्क नहीं किया जाएगा.'' | इससे जुड़ी ख़बरें जेल में 'रूम सर्विस' का मेन्यू गजट में छपा15 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हज़ारों क़ैदियों को मुक्तिदाता की प्रतीक्षा23 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस हत्या तो हुई नहीं, पर जेल हो गई...26 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस तिहाड़ की मौतों के बारे में जवाब तलब13 जून, 2007 | भारत और पड़ोस भारत में अहम न्यायिक सुधार05 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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