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गुरुवार, 15 सितंबर, 2005 को 12:32 GMT तक के समाचार
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जेल में 'रूम सर्विस' का मेन्यू गजट में छपा

 रेटलिस्ट
कहा जा रहा है कि यह पुलिस को बदनाम करने की साज़िश है
नमकीन और विदेशी शराब-- 200 रूपए, मोबाइल फ़ोन पर बातचीत--100 रूपए, जेल से बाहर का खाना--100 रूपए...

कोलकाता पुलिस की रिश्वत की ये दरें सियालदह कोर्ट के लॉकअप में बंद विचाराधीन कैदियों के लिए हैं.

कोलकाता पुलिस गजट के ताजा अंक में चौथे हिस्से में छपी इन दरों पर यहां बवाल खड़ा हो गया है.

इसने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा राज्य सरकार को भी सकते में डाल दिया है. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी इस पर हैरत जताते हुए इस मामले की जांच के निर्देश दिए हैं.

इस गजट को कोलकाता पुलिस की खुफिया शाखा के उपायुक्त ज्ञानवंत सिंह ने अपने हस्ताक्षर से अनुमोदित किया है. गजट में छपने वाली सामग्री के संपादन की जिम्मेदारी उनकी ही है.

सरकार ने इस लापरवाही के लिए उनकी लिखित रूप से निंदा की है. इसके अलावा उनके मुख्य सहायक असीम घोष और प्रूफरीडर निर्मल राय को कारण बताओ नोटिस दी गई है.

 पुलिस गजट में रिश्वत की दरें गलती से नहीं छपी हैं, बल्कि किसी ने जानबूझ कर ऐसा किया है. पुलिस विभाग की छवि खराब करने के लिए
पश्चिम बंगाल के गृह सचिव

इस मामले की विभागीय जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं. राज्य के गृह सचिव प्रसाद रंजन राय कहते हैं कि "पुलिस गजट में रिश्वत की दरें गलती से नहीं छपी हैं, बल्कि किसी ने जानबूझ कर ऐसा किया है. पुलिस विभाग की छवि खराब करने के लिए."

वे कहते हैं कि "खुफिया पुलिस उपायुक्त ज्ञानवंत सिंह के पिछले बेहतर रिकार्ड को ध्यान में रखते हुए उनके खिलाफ कोई और कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया गया है. उनको महज चेतावनी देकर छोड़ दिया गया है."

लापरवाही

मुख्यमंत्री भट्टाचार्य ने इस गजट के छपने के बाद ज्ञानवंत सिंह की इस लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि "किसी आईपीएस अधिकारी से ऐसी गलती की उम्मीद नहीं की जा सकती."

दिलचस्प बात है कि अब इस विभागीय जांच का जिम्मा ज्ञानवंत सिंह को ही सौंपा गया है. वे एक सप्ताह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे.

कहा जा रहा है कि इस मामले में खुफिया विभाग के एक पूर्व अधिकारी का हाथ है. शक प्रकट किया जा रहा है कि उसने मुख्य सहायक की मेज पर रखे गजट के प्रूफ की फाइल में रिश्वत की दरों का प्रूफ भी रख दिया था.

ज्ञानवंत सिंह ने बिना पढ़े ही उस पर हस्ताक्षर कर दिए और वह छप गया.

कोलकाता पुलिस के कार्यकारी उपायुक्त गौतम चक्रवर्ती भी ज्ञानवंत सिंह का बचाव करते हुए कहते हैं कि "परिसीमन आयोग की सुनवाई के लिए सुरक्षा के इंतजाम में व्यस्त होने के कारण ज्ञानवंत सिंह को हर कागज को ठीक से पढ़ने का समय नहीं मिला होगा. उन्होंने इसे एक रुटीन मान कर अपने हस्ताक्षर कर दिए होंगे."

वैसे रेट लिस्ट के छपने की जाँच तो हो रही है लेकिन यह किसी से नहीं छिपा है कि पेशेवर अपराधी कई जेलों के भीतर अपनी सुविधा का इंतज़ाम 'सेवा शुल्क' देकर करते रहे हैं.

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