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फ़िरोज़ की अर्ज़ी पर फ़ैसला 13 को | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात की एक अदालत गोधरा रेल आगज़नी काँड के एक अभियुक्त फ़िरोज़ ख़ान की उस याचिक पर 13 सितंबर को फ़ैसला देगी कि उसे अपनी पत्नी के साथ एक महीना रहने की ज़मानत दी जाए या नहीं. फ़रवरी 2002 में हुए गोधरा रेल आगज़नी कांड के एक अभियुक्त फ़िरोज़ ने अदालत से 24 जुलाई को गुज़ारिश की थीहै कि उन्हें एक महीने की अस्थायी ज़मानत पर रिहा किया जाए ताकि वे अपनी 'जिस्मानी ज़रूरतें' पूरी कर सकें. फिरोज़ ख़ान पिछले तीस महीनों से अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल में बंद हैं, उनका कहना है कि पत्नी के साथ शारीरिक संबंध क़ायम करने के लिए उन्हें जेल से बाहर जाने की अनुमति दी जाए. फिरोज़ ख़ान ने अदालत में अर्ज़ी दाख़िल करके कहा था कि पत्नी से अलग रहने के कारण उन्हें काफ़ी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है. फ़िरोज़ ख़ान को ज़मानत दी जाए या नहीं, यह फ़ैसला करने के लिए अदालत ने 13 सितंबर की तारीख़ तय की है. फ़िरोज़ ख़ान के वकील एडी शाह ने कहा है कि उनके मुवक्किल ने यह ज़मानत एक अधिकार के तौर पर नहीं माँगी है बल्कि मानवीय आधार पर यह अर्ज़ी दी है. शाह का कहना है कि अभियुक्तों को दो साल के बाद पैरोल पर भी रिहा किया जाता है, जबकि फ़िरोज़ ख़ान तो जेल में 30 महीने गुज़ार चुके हैं. दूसरी तरफ़ इस ज़मानत का विरोध करते हुए सरकारी वकील एचएम ध्रुव ने कहा है कि जब कोई व्यक्ति क़ानूनी प्रक्रिया के दौरान जेल रहता है तो उसके अधिकार कम हो जाते हैं जिनमें मूलाधिकार भी शामिल हैं. सरकारी वकील ने कहा कि अदालत इस मामले पर कोई भी फ़ैसला सामान्य अधिकारों, मानवाधिकारों और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए करेगी. उन्होंने कहा कि पैरोल का मामला सिर्फ़ मुजरिमों पर लागू होता है, उन अभियुक्तों पर नहीं जिनपर मुक़दमा चल रहा होता है. एक अन्य वरिष्ठ वकील का कहना था कि इस मामले में पूरा विवेकाधिकार अदालत का है. उनका कहना था कि ऐसा पहले भी एक मामला हो चुका है और उसमें मुक़दमे की सुनवाई में देरी के सिवाय और कोई नई चीज़ नहीं निकली. |
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