|
एक मिसाल है भारत का लोकतंत्र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत जब लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा रहा था उस समय सिर्फ़ गोरी नस्ल, अमीर, ईसाई और एक भाषा बोलने वाले देशों में ही सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था मौजूद थी. पिछले 60 सालों में भारत में लोकतंत्र के सफल होने की दो महत्वपूर्ण वजहें हैं. पहला, इसने सिद्ध किया कि भारतीय उपमहाद्वीप में ग़रीबी, व्यापक निरक्षरता और विविधता लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नहीं जाती बल्कि उसकी ज़रूरी बनाती है. दूसरा, भारत का लोकतंत्र बहुलवाद पर आधारित राष्ट्रीयता की कल्पना पर टिका हुआ है, न कि साझा इतिहास, एक भाषा और सबको समाहित कर लेने वाली संस्कृति पर. महत्वपूर्ण अध्याय सिर्फ़ दक्षिण एशिया की ही बात करें तो हम भारत और क्षेत्र के दूसरे देशों के बीच यह अंतर पाएँगे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में उनके विशिष्ट धार्मिक समुदायों का दबदबा है. मसलन, नेपाल एक हिंदू देश है, पाकिस्तान और बाँग्लादेश इस्लामिक गणराज्य हैं और श्रीलंका का संविधान बौद्ध धर्म और सिंहला भाषा को सबसे महत्वपूर्ण स्थान देता है. दक्षिण एशिया के हाल के इतिहास का महत्वपूर्ण सबक़ यह है कि जो लोकतंत्र नागरिकों को दो दर्जों में बाँटता है वो ज़ल्द ही लोकतंत्र नहीं रहता, कुछ और बन जाता है. भारत कई ऐतिहासिक कारणों से इस रास्ते पर नहीं गया. उपनिवेशवाद की चुनौतियों के जवाब में 19वीं सदी में बहुलवादी राष्ट्रवाद उभरकर आया. इस बहुलवादी राष्ट्रवाद का आधार यह था कि उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ खड़ी हुई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस निर्माण की प्रक्रिया से गुज़र रहे राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में बोल रही थी जिसके सदस्यों में पूरे भारत का प्रतिनिधित्व था. एक औपनिवेशिक सत्ता से जूझने और उसके बाद विभाजन की त्रासदी झेलकर भारत बहुलवादी लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध हुआ. बहुलवाद भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया क्योंकि भारत में रह रहे विभिन्न जातियों, धर्मों, क्षेत्रों के लोगों को साथ जोड़े रखना उसके लिए अपरिहार्य हो गया. यही अंतिम राजनैतिक लक्ष्य था: लोकतांत्रिक दायरे में इस उपमहाद्वीप की विविधता बनाए रखना. बाकी सब पर विचार-विमर्श से हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य हैं. हितों का संतुलन
गणराज्य की राजनैतिक संस्कृति विशेष हितों, दीर्घसूत्री कार्यक्रमों, बड़े-बड़े वादों, तुष्टीकरण, प्रतीक और सार्वजनिक क्षेत्र में विभिन्न जातियों को स्थान जैसे मुद्दों से बनकर तैयार हुई. जिसे हम एक शब्द में 'लोकतांत्रिक राजनीति' भी कह सकते हैं. भाषा, धार्मिक पहचान, वर्ग, लिंग और जाति सभी भारतीय राजनीति की चक्की में पीसे गए लेकिन कोई एक पहचान या सिद्धांत लंबे समय तक नहीं चल सका. यह एक राजनैतिक संस्कृति है जो काम करती है. मिसाल के तौर पर कोई कुर्द या तमिल बहुसंख्यक राज्य अपनी विशिष्ट पहचानों पर अधिक ज़ोर देगा तो भारतीय यही सोचेगा कि उनका वज़ूद न ही हो तो अच्छा है. भारतीय अपने इतिहास से यह जानते हैं कि बहुलवादी लोकतंत्र हिंसा के बावजूद काम कर सकते हैं और जातीय राष्ट्रवाद की अंतिम परिणति क्या होती है. भारत में लोकतंत्र के सफल होने की बड़ी वजह यह है कि इस विविधता वाले देश ने प्रतिनिधि सरकार की व्यवस्था अपने यहाँ कायम की है. यह उपलब्धि लोकतंत्र को कुछ ख़ास सांस्कृतिक संदर्भों और राजनीतिक दलीलों से मुक्त करती है. उदाहरण के लिए, पश्चिमी देशों के कुछ विचारकों के अनुसार इराक़ में सफलता न मिल पाने की बड़ी वजह वहाँ रह रहे तीन अलग-अलग समुदाय-शिया, सुन्नी और कुर्द हैं. उनके हिसाब से इस तरह अलग-अलग पहचान वाले लोगों के एक जगह होने से एक कृत्रिम राज्य का निर्माण होता है जो विखंडित भी हो सकता है. इस दलील के मुताबिक़ इराक़ एक लोकतंत्र या एक राष्ट्र नहीं बन सकता क्योंकि वह विविधतापूर्ण है. अगर लोकतांत्रिक भारत अस्तित्व में न होता तो कोई इस तरह के राष्ट्र के बारे में सोच भी नहीं सकता था. आशंकाएँ
भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को ख़तरा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जैसे राजनीतिक दलों से है जो बहुसंख्यक भावना को भड़काकर सत्ता की दावेदारी करेंगे. इससे भारत के बहुलवादी लोकतंत्र को ख़तरा है क्योंकि भाजपा यूरोपीय राष्ट्रवादी प्रतीकों की बात करती हैं जहाँ राष्ट्र पर बहुसंख्यकों का मालिकाना हक़ होता है. भारत के मामले में यह लोग हिंदू हैं. यदि भाजपा और उसकी विचारधारा भारत में हावी होते हैं तो पूरे उपमहाद्वीप में श्रीलंका जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. ऐसा नहीं होना चाहिए. भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भारत पर शासन किया लेकिन वे बहुसंख्यक हिंदू समाज को राजनीतिक पहचान देने में सफल नहीं रहे. गणराज्य का संविधान और उसके रक्षक सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों के लिए यह असंभव बना दिया कि वो संविधान के मूलभूत स्वरूप के साथ खिलवाड़ कर सकें. दूसरी ओर, मतदाताओं की विविधता ने भारत के राजनीतिक गठबंधनों को ऐसी चुनावी गणित से समझौता करने पर मजबूर कर दिया जिसमें बहुलवाद बहुत अहम हो गया, यही वजह है कि भारत में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर कोई ख़तरा नहीं दिखता. (मुकुल केशवन एक इतिहासकार और लेखक हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें कल भी हम झोपड़ी में थे, आज भी...30 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस भारतीय लोकतंत्र के साठ साल का लेखा-जोखा10 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'आज देश की राजनीति देख रोना आता है'06 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की उपेक्षा'07 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस कुछ लोगों के लिए धूम मचाता भारत12 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस भारत में स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगाँठ14 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'देश का सबसे अच्छा समय आना अभी बाक़ी'15 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||