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रविवार, 12 अगस्त, 2007 को 22:22 GMT तक के समाचार
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कुछ लोगों के लिए धूम मचाता भारत

मार्क टली
मार्क टली 22 सालों तक भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे
विभाजन के साथ ही हुई हिंसा और उठापटक के 60 साल बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने की तरफ़ कदम बढ़ा चुका है.

मैं जब 1965 में भारत आया तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि जो भी राजनयिक भारत में अपना कार्यकाल ख़त्म करके वापस लौटते थे वो विदेश से ख़रीदे अपने सभी सामान को भारत में बेच देते थे. इनमें उनके इस्तेमाल में लाई हुई 'लिपिस्टिक' और 'अंडरविअर' तक होते थे.

मुझे ज़ल्द ही इसकी वजह पता लग गई. दरअसल दुकानों में सिर्फ़ भारतीय सामान ही रखा जाता था और वो बहुत दोयम दर्जे का होता था.

मुझे अब भी भारत में बने एक ब्लेड से दाढ़ी बनाने का दर्द याद है और साथ ही यह भी याद है कि भारतीय बियर से ग्लिसरीन कैसे अलग करते थे.

अब ये सब बदल गया है.

बदलाव

मैंने अपने बचपन के शुरुआती दिन कलकत्ता में गुज़ारे थे. जब मैं वहाँ गया तो मैं पुरानी यादों में खोकर थोड़ा भावुक हो गया. मैंने पाया कि एक ज़माने में भारत की आर्थिक राजधानी रहा कलकत्ता कैसे धीरे-धीरे मरता जा रहा है.

शहरों की योजना बनाने वाले एक अंग्रेज़ ने पूर्वानुमान लगाया था कि कलकत्ता सबसे पहले बर्बाद होने वाले शहरों में होगा.

जमशेदपुर का टाटा स्टील का कारखाना
भारत की टाटा स्टील कंपनी ने विदेशी स्टील कंपनी कोरस का अधिग्रहण किया

अंग्रेज़ों के समय बहुत महत्वपूर्ण रहीं इमारतों पर पेड़ उग रहे थे.

लेकिन अब कलकत्ता तरक्की की राह पर है और हवाईअड्डे के रास्ते पर एक पूरा नया शहर विकसित हो रहा है.

एक बार एक टिकट निरीक्षक को शिकायत करते हुए मैंने कहा कि मैंने सुपर-फ़ास्ट ट्रेन पर यात्रा करने के लिए अतिरिक्त मूल्य चुकाया लेकिन वह ट्रेन बहुत तेज़ नहीं चल रही थी.

उस टिकट निरीक्षक ने मुझे सुधारते हुए कहा, "सुपर-फ़ास्ट ट्रेन ही है, बस कुछ धीरे जा रही है."

कई सालों तक भारतीय अर्थव्यवस्था 'हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ' के मुताबिक तीन फ़ीसदी से कुछ अधिक की दर से ही बढ़ती रही. अब अर्थव्यवस्था आठ फ़ीसदी से अधिक की दर से बढ़ रही है.

ये सब लाइसेंस-परमिट राज के ख़ात्मे की वजह से संभव हो सका.

पहले भारतीय अर्थव्यवस्था बंद थी जिसने नवोदित उद्योगों को विदेशी कंपनियों की प्रतियोगिता से दूर रखा था. कम मात्रा में उपलब्ध संसाधनों के वितरण के नाम पर भारत के नौकरशाहों ने ख़ुद को मज़बूत किया.

नौकरशाहों से मिले लाइसेंस के बिना कोई भी किसी चीज़ का निर्माण नहीं कर सकता था. पहले से काम कर रहे उद्यमी नौकरशाहों को घूस खिलाते थे ताकि नए लोगों को लाइसेंस न मिल पाए.

अर्थव्यवस्था

भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के चारों तरफ़ बनाई दीवार को तब गिराना शुरू किया जब 1991 में वो दिवालिएपन की कगार पर पहुँच गया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत को लाइसेंस-परमिट राज ख़त्म करने की कीमत पर आर्थिक सहायता देने की बात कही.

अर्थव्यवस्था खुलने से भारत की उद्यमी प्रतिभा का पता लगा. अमरीका ने एक नया शब्द खोजा 'बैंगलोर्ड'. इसका मतलब है भारत की सूचना तकनीकी राजधानी बंगलोर की वजह से पश्चिमी देशों में लोगों का अपनी नौकरी खो देना.

अब दुनिया की बड़ी कार कंपनियों के भारत में कारखाने हैं और वो अब भारत में ही बनाई जाती हैं और डिज़ाइन की जाती हैं.

विरोध
भारत में कुछ दुकानदार बड़ी विदेशी कंपनियों के ख़ुदरा क्षेत्र में प्रवेश का विरोध कर रहे हैं

भारतीय कंपनियाँ अब विदेशी कपंनियों का अधिग्रहण कर रही हैं. जैसे भारत की एक कंपनी ने स्टील कंपनी कोरस का अधिग्रहण किया है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यवसायियों की शिकायत है कि भारत ने अपने दरवाज़े अभी पूरे तरीके से नहीं खोले हैं. विदेशी बैंक वाले, बीमे वाले, ख़ुदरा व्यापार करने वाले और निर्माण कंपनियाँ अपने काम के दौरान भारत में होने वाली दिक्कतों और चीन में मिलने वाली सहूलियतों का ज़िक्र करते हैं.

भारत का इस बारे में कहना है कि वह अपनी विशेष राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की वजह से अर्थव्यवस्था का रुख़ तय करने और बाज़ार को नियत्रंण में रखने की आज़ादी अपने पास रखना चाहता है.

ख़ुदरा क्षेत्र इसका अच्छा उदाहरण है.

सरकार को इस बात का डर है कि ख़ुदरा बाज़ार में विदेशी कंपनियों के प्रवेश से लाखों छोटे दुकानदारों की रोज़ी-रोटी ख़त्म करने के दूरगामी राजनीतिक प्रभाव होंगे.

इस समय वालमार्ट जैसी कंपनियाँ भारत के ख़ुदरा बाज़ार में काम करने के लिए आतुर हैं.

भारत छोटे किसानों का देश है और वो इन किसानों को दुनिया के दूसरे हिस्सों के बड़े-बड़े खेत वाले किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं उतार सकत.

समस्या

भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इस बदलाव का असर अमीर और मध्यवर्ग के जीवन पर ही पड़ा रहा है. अभी भी शहरों और गांवो में बहुत ग़रीबी है.

बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौज़ूदा आर्थिक वृद्धि का फ़ायदा ग़रीबों तक कभी नहीं पहुँच पाएगा और इसलिए अर्थव्यवस्था को उन्हें ध्यान में रखकर भी कदम उठाने चाहिए.

लेकिन यहाँ समस्या यही है कि सरकार की तरफ से काम तो यही नौकरशाह करेंगे जिन्होंने लाइसेंस-परमिट राज व्यवस्था खड़ी की थी.

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