BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 06 अगस्त, 2007 को 20:10 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
कहीं विकास तो कहीं पलायन

ट्रेन
भारत में कहीं विकास तो कहीं पलायन का प्रतीक बनती ट्रेनें
भारत जैसे विशालकाय देश को समझ पाना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रुर है लेकिन अगर पूरे देश को जोड़ने वाली कोई चीज़ चुनी जाए तो शायद यह काम थोड़ा आसान हो जाए.

भारत को जानने और समझने वाले दिग्गजों की राय में भारत को जोड़ने वाली कई चीज़ें हैं मसलन, क्रिकेट, सिनेमा, अंग्रेज़ी भाषा और ट्रेन.

रेडियो डॉक्यूमेंट्री के प्रोड्यूसर थे सुशील झा और प्रस्तुतकर्ता थीं पूजा तिवारी

मैंने चुना ट्रेन क्योंकि मुझे लगा कि यह न केवल जनसाधारण का माध्यम है बल्कि आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद ट्रेन से देश की कई यादें भी जुड़ी हैं.

चाहे वो महात्मा गांधी की तीसरे दर्जे में की गई चंपारण यात्रा और उसके बाद का नील विद्रोह या फिर बंटवारे का दर्द हो. इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में ट्रेनों की छवि ज़रुर उभरती है.

मुंबई टू ठाणे

मैंने यात्रा शुरु की मुंबई से क्योंकि यहीं के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे तक 1853 में पहली ट्रेन चली थी. बोरीबंदर बाद में विक्टोरिया टर्मिनल ( वीटी )और अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल ( सीएसटी) हो गया है.

क़रीब दस साल पहले जब जाने माने लेखक सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल वीटी स्टेशन पर पहुंचे तो यहां की भीड़ और भागमभाग देखकर उल्टे पाँव लौट गए. उन्हें लगा कि वो इस भीड़ में गुम हो जाएंगे.

लेकिन मैं तो इसी भीड़ का हिस्सा था. इन लोकल ट्रेनों में बहुत कुछ दिखा. भारत भी और साथ में इंडिया भी.

एक बड़ा शहर, शहरों का जीवन, बड़ी इमारतें, विकास की ऊंची दर, भीड़भाड़, उम्मीदों से भरे नौजवान, आत्मविश्वास से भरी लड़कियां, भागमभाग भरी ज़िंदगी, पटरियों से सटी झुग्गियां और न जाने क्या क्या.

साल भर पहले इन लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाके लोगों को याद हैं लेकिन कहते हैं कि जीवन तो चलता है...डर है लेकिन क्या करें, नौकरी करनी है ऑफिस जाना है...तो ट्रेन में चढ़ना ही पड़ेगा.

लोगों ने खूब बात की लेकिन लब्बोलुआब ये है कि देश आज़ाद तो हुआ लेकिन भ्रष्टाचार, ग़रीबी और मुश्किलों की बेड़ियां नहीं टूटीं.

लोगों ने कहा झुग्गियों में जाइएगा तो और दुखी जनता मिलेगी. मुंबई की झुग्गियां तो अब विश्व प्रसिद्ध हैं लेकिन उनकी बात बाद में.

इन लोकल ट्रेनों में हालांकि वो भारत नहीं था जिसकी बात हर अख़बार में हर हफ्ते पढ़ रहा था..... द रॉकिंग इंडिया..

वो इंडिया दिखा मुंबई शहर के नरीमन प्वाइंट पर जहां पहुंचने के लिए भयंकर ट्रैफिक से गुज़रना पडा. यहां न्यूयॉर्क में पढ़ने वाली दो भारतीय बालाओं से मुलाक़ात हुई.

बड़ी तकलीफ़ से हिंदी बोल पा रही उर्वशी और पल्लवी का कहना था कि इंडिया रॉक्स यानी भारत आगे बढ़ रहा है. सब कुछ अच्छा अच्छा है. उनके शब्दों में हिप एंड हैप्पनिंग.

'मुझे क्या मिला'

झुग्गियों में इसके बिल्कुल उलट देश दिखा. सात बटा दस फुट के कमरे में दस लोगों का जीवन चलता है. इन्हें कमाना है तो रहना ही होगा.

इन झुग्गियों में रहने वालों के लिए भारत ने उन्हें कुछ नहीं दिया है. दरभंगा ज़िले से आए गौरीकांत कहते हैं कि 45 सालों में उन्हें भारत से दिक्कतों के अलावा कुछ नहीं मिला.

वो कहते हैं,'' बस नाम का देश है. मुझे क्या मिला. जिस दिन कमाया उस दिन खाया. नहीं कमाया तो भूखा सोना पड़ा. मुझे क्या मदद मिली बताइए. क्या दिया भारत ने.''

ऐसी झुग्गियां जिनके भीतर रहने वालों की ज़िंदगी सड़क पर खड़े होकर देखी जा सकती है. ये भी एक भारत है जो गांवों से पलायन कर बड़े शहरों में पहुंचा था.

इस यात्रा के दौरान कुछ बड़े नामों से भी मुलाक़ात हुई...गायक कैलाश खेर, भोजपुरी फ़िल्मों के सुपरस्टार रवि किशन, रेडियो की जानी मानी आवाज़ अमीन सयानी और राज बब्बर के पुत्र आर्य बब्बर.

भारत के बारे में सबकी अपनी अपनी समझ.

'पलायन का प्रतीक'

मज़दूर
बिहार ही नहीं कई अन्य राज्यों से भी शहरों की ओर पलायन जारी है

ट्रेनों के ज़रिए भारत को जानने की अपनी यात्रा में मुंबई जैसा विकसित शहर देख चुका था लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्य को भी जानता था.

पटना पहुंचा तो देश की अलग तस्वीर दिखी. राज्य भर से बाढ़ की ख़बर और प्लेटफॉर्म पर भारी संख्या उन लोगों की जो पलायन कर रहे थे.

इनके लिए ट्रेनें सबसे सुविधाजनक माध्यम हैं रोज़ी रोटी कमाने के लिए बाहर जाने का.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के लिए पटना में काम कर रहे राजीव झा कहते हैं,'' बिहार ने पिछले पंद्रह सालों में तीन रेल मंत्री दिए हैं- लालू जी, रामविलास पासवान जी और नीतीश कुमार. तो लोगों को उम्मीद ट्रेन से रहती है. सभी नेताओं ने बिहार में ट्रेनों का जाल बिछाया लेकिन उससे हुआ क्या. विकास तो हुआ नहीं, लोगों को पलायन का सुलभ साधन मिल गया. मेरे लिए ये ट्रेनें बिहार में पलायन का प्रतीक हैं. ''

चाहे वो हरियाणा में मज़दूरी कर के लौट रहे सत्यनारायण राम हों या फिर मज़दूरी करने हैदराबाद जा रहे अवधेश हों उनके लिए आज़ादी का कोई ख़ास मतलब नहीं है.

अवधेश कहते हैं,'' बिहार में भूखों मर रहे थे तो क्या करते. हैदराबाद में मजूरी करते हैं तो पेट भरता है. आज़ादी तो अमीरों के लिए है. हम तो पेट भरने की सोचते हैं हर दिन.''

मुझे लगा कि ये पटना जैसे शहरों की हालत हो सकती है लेकिन कम से कम गांवों में बेहतर ज़िंदगी होगी. पटना से चले छपरा की तरफ.

रास्ते में एक स्टेशन पडा गोल्डनगंज. नाम देखकर मैंने सोचा यहीं के लोगों से बात की जाए. हो सकता है इनका जीवन गोल्डन हो.

लेकिन नहीं...यहां भी वहीं समस्याएं...वही दिक्कतें...

एक ग्रामीण ग़रीबदास का कहना था,'' कहीं भी जाइए, सर ऐसा ही मिलेगा. नौकरी है नहीं. ज़मीन बाढ़ में डूबा हुआ है. भूखे मरेगा लोग नहीं तो और क्या होगा. बिहार क्या आप जाइए उड़ीसा में वहां भी तो ग़रीबी है. आंध्र प्रदेश के गांव में और महाराष्ट्र के गांव में क्या होता है, सब अख़बार में पढ़ते हैं.''

ग़रीबदास प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं. उनके लिए आजा़दी बस इतनी है कि उनके पास नौकरी है तो वो खुश हैं...बस इतना ही...

बिहार से दिल्ली का रास्ता मैंने पहले भी कई बार ट्रेनों से तय किया है.कई लोग मिलते हैं. छात्र, व्यवसायी, मज़दूर, शिक्षक और न जाने कौन कौन. जितनी मर्ज़ी बात कीजिए...कोई कहता है कि देश विकसित हुआ है. गांवों में मोबाइल फ़ोन है टीवी है (बिजली नहीं रहती तो क्या). इंटरनेट भी है कहीं कहीं.

लेकिन उन्हें अपना कैरियर शहर में दिखता है.

सब बड़े शहर आ रहे हैं. कोई पढ़ने, कोई काम करने. कोई अपना भविष्य आजमाने.

वो कहते हैं कि अब गांव भी गांव नहीं रहे. गांव भी बड़े हो गए हैं और वहां अधकचरी सुविधाएं भी हैं वो अब कस्बे बन गए हैं. तो क्या अब भारत कस्बों का देश हो रहा है...

ट्रेनों के ज़रिए भारत को जानने के इस सफ़र में मैंने तो यही महसूस किया कि पिछले साठ वर्षों में यही बदला है कि अब भारत गांवों के देश से कस्बों का देश होता जा रहा है.

इससे जुड़ी ख़बरें
पढ़ाई अब ज्ञान नहीं, रोज़गार के लिए
30 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस
कल भी हम झोपड़ी में थे, आज भी...
30 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस
'आज देश की राजनीति देख रोना आता है'
06 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस
मुंबई की लोकल ट्रेनें
11 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>