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बदस्तूर जारी है सपने देखना... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दस सालों में मुंबई बदल गया है. मेरे लिए एक बार फिर मुंबई जाने का मौक़ा पुरानी यादों को ताज़ा करने जैसा था. 1997 में मैं अपनी किस्मत आजमाने मुंबई आया था. अब बीबीसी के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने पहुंचा था. ज़ाहिर है बहुत कुछ बदल गया था मेरी ज़िंदगी में भी और मुंबई की ज़िंदगी में भी. अब ये मुंबई है 1997 का बंबई नहीं. नरीमन प्वाइंट पर कुछ इमारतें और बड़ी हो गई थीं. ट्रैफिक और बढ़ गया था और साथ ही समुद्र के किनारे बैठने वालों की संख्या और बढ़ गई थी. एक ज़माने में मैं भी इन्हीं में से एक हुआ करता था और सोचा करता था कि अपना दिन भी आएगा..सात बटा दस फुट के कमरे में सोते सोते मैंने भी कई सपने देखे थे, उन कमरों में जहां करवट बदलने तक की जगह मुश्किल से मिलती थी. ये झुग्गियाँ और इनमें रहने वाले लोग अब भी वहीं है.कुछ झुग्गियां तोड़ी गई हैं. अब वहां लंबा चौड़ा गटर है जिसकी बदबू से मैं वाकिफ हूँ क्योंकि झुग्गियों की यह बदबू भी नहीं बदली है. सपनों का शहर नहीं बदली है तो इन झुग्गियों में रहने वालों की ज़िंदगियाँ. कुछ लोग दरबान से ड्राइवर हो गए हैं. ज़िंदगी के पायदान पर एक सीढ़ी और चढ़ ली है बस. जिनकी झुग्गी या खोली टूटी उनमें से कुछ को छोटे फ्लैट मिले. सो कुछ खोलीवाले फ्लैटवाले हो गए. यही बदला है. भागमभाग बढ़ गई है. ट्रैफ़िक बढ़ गया है. शहर ऊँचाई में और बढ़ गया है. स्टेशनों की अफरा-तफरी बढ़ गई है. ट्रेन में बम विस्फोट के बाद डर बढ़ गया है. सिक्योरिटी बढ़ गई है. ट्रैफ़िक पर चालान करने वाले हवलदार बढ़ गए हैं. चौपाटी पर गंदगी बढ़ गई है. पाव भाजी के दाम बढ़ गए हैं. नौकरी के कुछ ज़रिए बढ़ गए हैं सो अब पढ़ा लिखा भी भाग कर बंबई आ सकता है. कॉल सेंटर में काम करके हीरो बनने का सपना देख सकता है. नहीं बदली है तो एक आदत जो मुंबई की ख़ास अदा भी है. सपने देखने की. भूखे पेट सपना देखना कोई मुंबई वालों से सीखे. शायद दुनिया का यह इकलौता शहर होगा जहां हर आदमी को यह लगता है कि उसका दिन ज़रुर आएगा. उसका जैकपॉट ज़रुर लगेगा. झुग्गियों में जिनके साथ मैंने कई महीने बिताए थे वो भी मिले. उन्हें ऐसा लगता है मैं बीबीसी में हूँ तो कामयाब हूँ . मुझे देखकर उनकी आँखों में एक चमक सी कौंधती है जो सिर्फ इतना कहती है हमारा भी दिन आएगा और उनकी आंखों की चमक मुझे उम्मीद की किरण दिखाती है जो कहती है कि तुम्हारा दिन भी ज़रुर आएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें उसे चाहिए दुर्लभ 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप' का ख़ून18 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'बार गर्ल्स' ने गोवा का रूख़ किया24 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस चीन का पहला 'विकसित शहर'04 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस नाम में बहुत कुछ रखा है जनाब!22 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस सलाखों के पीछे संजय की पहली रात01 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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