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कोई तो आवाज़ उठाए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज बहुत वेदना, अफसोस और आक्रोश के साथ कलम उठानी पड़ रही है. इनसानी दिमाग और सामर्थ्य से फौलाद को भी पिघलता हुआ देखने में जो रोमांच होता है, उससे कहीं ज्यादा अफ़सोस किसी फौलादी इरादे वाले इनसान को पिघलता और कमजोर होता हुआ देखने पर होता है. जब आदर्श और मिसालें धराशायी होती हैं, तो एकदम शून्य-सा छा जाता है. मन अच्छाई को हारता हुआ देखकर आक्रोशित और आंदोलित हो जाता है. देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह की खुशियों के बीच, उनके सम्मान में दी गई इक्कीस तोपों की सलामी की गर्जना के बीच भी एक कराह इस तमाम जश्न के उल्लास को चीरती हुई सीधी दिल में उतर गई. ये कसक, ये कराह है देश की उस पहली महिला आईपीएस अधिकारी की, जिसे लोग किरण बेदी के बजाय 'क्रेन बेदी' के नाम से ज्यादा जानते हैं. केवल महिलाओं ही नहीं, जिंदादिली और नेकनियति में विश्वास रखने वाले हर शख्स द्वारा आदर्श के रूप में फख्र से देखी जाने वाली किरण बेदी को व्यवस्था के हाथों हारता हुआ देखना बेहद अफसोसजनक है. वो महिला जो ताउम्र खुद व्यवस्था सुधारने में लगी रही, वो महिला जो देश के लोगों को यह यकीन दिलाती रही कि पुलिस और कानून से डरें नहीं, व्यवस्था में यकीन करें, वह खुद व्यवस्था को कोस रही है, कह रही है कि इस व्यवस्था पर यकीन नहीं किया जा सकता, ये व्यवस्था ईमानदारी, नि:स्वार्थ सेवा, त्याग और तपस्या का सही सिला नहीं देती ...तो हम भीतर तक हिल जाते हैं. समर्थन में आवाज़ बहुत घबराहट होती है कि बुलंद हौसलों वाली ये महिला जिसने दूसरों को हिम्मत दी है, जिसने स्त्री सशक्तिकरण की एक नई इबारत गढ़ी है, वो महिला जिसने पुस्तक लिखी- 'आय डेयर' यानी 'हिम्मत है ...' वही कहे कि हिम्मत नहीं है, तो विश्वास का एक महत्वपूर्ण आधार दरक जाता है. क्या हमें ऐसा होने देना चाहिए? क्या कोई भी उसके समर्थन में आवाज नहीं उठाएगा? दरअसल वरिष्ठता, योग्यता और अनुभव इन सभी के आधार पर सुश्री किरण बेदी को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाया जाना था. इसके लिए उनके नाम की सिफारिश भी भेजी जा चुकी थी, लेकिन लंबे इंतजार के बाद बुधवार 25 जुलाई को घोषणा हो गई डडवाल के नाम की, जो उनसे दो साल जूनियर हैं और कथित रूप से कई तरह के विवादों और आरोपों से घिरे हुए हैं. जाहिर है, किरण बेदी को गुस्सा आना स्वभाविक था. एक टेलीविजन चैनल को दिए साक्षात्कार में किरणजी ने जो बातें कही, वो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिए पर्याप्त हैं. आमतौर पर शांत और संयत रहने वाली इस महिला अधिकारी का गुस्सा और कुछ न कर पाने की मजबूरी उनकी आँखों के पानी में तैरती साफ देखी जा सकती थी. वो अपने 35 साला कॅरियर को रह-रहकर याद कर रही थीं और यही सोच रही थीं कि उनसे कहाँ और क्या गलत हो गया? उन्होंने कहा कि एक गलती तो उनसे ये हो गई कि वे जनता की सेवक बनकर काम करती रहीं और उन्होंने पार्टियों में जाकर ऐसे दोस्त नहीं बनाए जो खुश होकर उनका काम कर दें. उन्होंने 19-20 घंटे काम किया, पुलिस ट्रेनिंग का काम किया और नशामुक्ति आंदोलन चलाए, लेकिन ऊँचे ओहदे पर बैठे अधिकारी और राजनेता इसे उपलब्धि नहीं मानते. जो अधिकारी जनता के करीब जाता है, वो ऊँचे अधिकारियों और राजनेताओं से दूर हो जाता है. किरण बेदी के ये बयान हमारी पूरी व्यवस्था के ऊपर जोरदार तमाचा हैं. जिस जनता से नजदीकी के चलते किरण बेदी को उनका जायज हक नहीं मिल पाया, वही जनता यदि उनके पक्ष में आवाज नहीं उठाएगी तो कौन उठाएगा? इस वक्त ये जरूरी है कि केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अच्छाई पसंद जनता किरण बेदी के पक्ष में लामबंद हो जाए. किरण बेदी से प्रभावित होकर एक टीवी धारावाहिक बना था 'उड़ान'. उसकी प्रमुख किरदार जब पुलिस अधिकारी बनने के बाद व्यवस्था से जूझती है तो अपने पिता, जिन्होंने उसे यहाँ तक पहुँचने का हौसला दिया था, से पूछती है- "कुछ आदर्श तो आपने गलत ही सिखा दिए न बाबा?". आज किरण बेदी यही सवाल पूरी व्यवस्था और देश की आम जनता से कर रही हैं. |
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