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पुलिस वालों की ख़बर लेता है 'आज़ाद पुलिस' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बहुत सुना था इस शख़्स के बारे में – अपने आप को “आज़ाद पुलिस” कहता है – कौन है ये व्यक्ति, आख़िर क्यों घूमता है वो अपने रिक्शा पर आज़ाद पुलिस का बोर्ड लगा कर? ज़हन में ऐसे बहुत से सवाल थे, जिनका जवाब ढ़ूँढ़ने के लिए एक दिन मैं सुबह घर से निकल पड़ी. कहाँ मिलेगा आज़ाद पुलिस मुझे, कुछ अंदाज़ा नहीं था, मालूम था तो सिर्फ इतना कि गाज़ियाबाद की सड़कों पर रिक्शा चलाता है. 3-4 घंटे घूमने के बाद एक रिक्शा आता दिखाई दिया जिस पर बड़े-बड़े बोर्ड लगे थे. “क़ानून अंधा नहीं – गूंगा बहरा है”, “बिना टोपी के पुलिस दिखाई दी तो चालान काट दिया जाएगा”, "हम बदलेंगे–जग बदलेगा" ऐसे ही कई और नारों से सजा था उसका रिक्शा. आज़ाद पुलिस रिक्शे से थोड़ा ध्यान हटा तो नज़र पड़ी खाकी वर्दी पहने छोटी सी कद-काठी के अधेड़ उम्र के पतले-दुबले व्यक्ति पर जो अपने आपको 'आज़ाद पुलिस' कहता है. वैसे उनका नाम है ब्रह्मपाल प्रजापति.
उनके चहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था. रोज़ी-रोटी के लिए रिक्शा चलाते हैं, लेकिन रिक्शे पर तामझाम इतना है कि अक्सर सवारी बैठने से कतराती है. मजबूरी में अपनी आजीविका के लिए रिक्शे पर लकड़ी ढोने का काम करते हैं. दूसरे दर्जे तक पढ़े ब्रह्मपाल, समाज सेवा भी करते है. अकेले अपने दम पर. पुलिस वालों का चालान वे इस समाजसेवा के तहत पुलिस में भ्रष्टाचार और लापरवाही पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे है. अनैतिक और लापरवाही भरा व्यवहार करते पाए जाने पर पुलिस वालों का चालान कर देते है. इस चालान से भले ही जुर्माना या सज़ा न हो, पर सार्वजनिक रुप से इज़्ज़त उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ते. बीबीसी से बात करते हुए ब्रह्मपाल ने बताया कि ये मुहिम शुरु करने के पीछे उनके कुछ व्यक्तिगत कारण थे, लेकिन अब इसका दायरा बड़ा हो गया है. वे बताते हैं, "दस साल की उम्र से ही मैंने कहानी लिखनी शुरु कर दी थी, और जब मैं उस लायक हो गया कि दूसरे उस पर फ़िल्म बना सकें तो लोगों और प्रशासन ने मेरे साथ धोखा किया." "मुझे इस बात का एहसास हुआ कि सिर्फ पुलिस आज़ाद है, बाक़ी सब गुलाम हैं, लेकिन मैंने देखा है कि पुलिसवाले वर्दी में नहीं होते, शराब पीकर और बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाते हैं, मैं इन सबका ग्यारह धाराओं के अंतर्गत चालान काटता हूँ." उनसे पूछा कि आज़ाद पुलिस का मतलब क्या है भला, तो उन्होंने कहा, "आज़ाद पुलिस का मतलब है कि पुलिस आज़ाद होती है, क़ायदे-क़ानून का डंडा उसके हाथ में दिया गया है, लेकिन आज़ादी पुलिस को मिली है वो सिर्फ़ अपनी जेब भरने के लिए नहीं है" लोगों की नज़र ब्रह्मपाल की इस अकेली लड़ाई पर लोगों की राय अलग-अलग है. ब्रह्मपाल कुछ समय से एक लकड़ी के व्यापारी के पास काम करते हैं, उसके मालिक अनीष अग्रवाल ब्रह्मपाल के बारे में कहते हैं, "पिछले 10-12 सालों से आज़ाद पुलिस मेरे पास लकड़ी ढोने का काम कर रहा है और उस के साथ-साथ वो लड़ता भी है, इस ग़रीबी में भी कुछ न कुछ उन लोगों के ख़िलाफ़ करता रहता है जो क़ानून के ख़िलाफ़ काम करते है."
ब्रह्मपाल, चूंकि पुलिसवालों का चालान काटते हैं, तो हमने सोचा कि क्यों न इन्हीं लोगों से पूछा जाए कि वो इस बारे में क्या सोचते हैं, लेकिन सिपाहियों ने ये कह कर बात टाल दी कि इस विषय पर सिर्फ आला अफ़सर ही बात कर सकते हैं. और जब गाज़ियाबाद के कवि नगर के थाना अध्यक्ष अनिल समानिया से पूछा तो उन्होंने कहा कि वे ब्रह्मपाल को सिरफिरा मानते है. वे कहते हैं, "आप ये बताइए कि इसको कोई अधिकार है क्या, ऐसे तो ये पुलिस या आम आदमी किसी का भी चालान काट सकता है, आज़ाद पुलिस का झंडा लगाकर पागलों की तरह सड़कों पर घूमता है." पुलिस वाले तो उसे सिरफिरा मानते हैं लेकिन सब लोग ऐसा नहीं मानते. भले ही एकबारगी उनका काम अटपटा सा दिखता हो लेकिन वे अपने इसी अटपटे काम से वे लोगों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हैं. |
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