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शुक्रवार, 06 जुलाई, 2007 को 12:43 GMT तक के समाचार
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एड्स के रोगी अनुमान से कम
स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि नए आँकड़े अधिक विश्वसनीय हैं
भारत में एचआईवी और एड्स के साथ जी रहे लोगों की संख्या पहले के अनुमानों के मुक़ाबले काफ़ी कम है.

नए आंकड़ों के अनुसार भारत में एचआईवी और एड्स संक्रमण से जूझ रहे लोगों की संख्या 20 लाख से 31 लाख के बीच है.

नई दिल्ली में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणि रामदॉस ने शुक्रवार को राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम-तीन (एनएसीपी-3) की घोषणा करते हुए ये बात कही.

भारत के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नैको) के अनुसार पहले ये आंकड़ा लगभग 52 लाख का था जबकि यूएनएड्स के अनुसार देश में 57 लाख लोग एड्स या एचआईवी संक्रमित थे.

अधिकारियों का कहना है कि ताज़ा आँकड़े सटीक हैं जबकि पिछले पुर्वानुमान आशंका पर अधिक आधारित थे.

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, "नए आकलन से पता लगता है कि देश में 20 से 31 लाख लोग एचआईवी-एड्स के साथ जी रहे हैं. यह संख्या कोई छोटी नहीं है, असल में काफ़ी बड़ी है, यह हमारे लिए चिंता का विषय है."

उन्होंने कहा कि भारत पर हमेशा एड्स के मामले को कम करके आंकने का आरोप लगता रहा है जो सही नहीं है.

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि हमने इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए भारत और दुनिया भर के विशेषज्ञों से राय ली थी और विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूएनएड्स जैसे संगठनों का सहयोग लिया था.

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (नैको) के निगरानी विभाग 'सेंटिनल सर्विलेंस सिस्टम' और राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वेक्षण के आंकड़ों से भी इस निष्कर्ष तक पहुँचने में सहायता मिली.

अब एनएसीपी-3 के तहत लोगों के लिए परीक्षण केंद्रों की संख्या 5000 की जाएगी और साथ ही निजी भागीदारों को शामिल करते हुए 10 हज़ार नए परीक्षण केंद्र खोले जाएँगे.

आकलन

नए आकलन के बाद ये साफ हो गया है कि भारत में सबसे अधिक एचआईवी प्रभावित लोग नहीं रहते और नाइजीरिया और दक्षिणी अफ़्रीका भारत की अपेक्षा अधिक प्रभावित हैं.

एड्स जागरुकता अभियान
स्वयंसेवी संगठनों का कहना है कि समस्या की गंभीरत को समझा जाना चाहिए

पहले ये आकलन किया गया था कि भारत में एचआईवी-एड्स का फैलाव कुल आबादी का 0.9 फ़ीसदी था लेकिन अब पता चला कि देश में एचआईवी-एड्स का फैलाव 0.36 फ़ीसदी ही है.

संयुक्त राष्ट्र की तरफ से 57 लाख का आंकड़ा दिए जाने के पीछे वजह ये थी कि उन्होंने हर साल चार महीनों तक गर्भवती औरतों, वेश्याओं और मादक पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले लोगों के ख़ून की जांच की थी.

हाल में आए एक जनसंख्या आधारित सर्वे में ये साफ हुआ है कि भारत में एचआईवी मामले को बढ़ाचढ़ा कर बताया जाता था.

इस सर्वेक्षण में लगभग एक लाख लोगों के ख़ून का नमूना लिया गया था.

यूएनएड्स का कहना है कि ऐसे सर्वेक्षण अधिक सटीक हैं.

लेकिन एचआईवी-एड्स के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे स्वयंसेवी संगठनों का कहना है कि चरमराती सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को देखते हुए इस क्षेत्र में और भी काम किए जाने की ज़रूरत है.

पिछले महीने स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में गर्भवती महिलाओं के संक्रमित होने की वजह से स्थिति गंभीर हो गई है.

उनका कहना था कि अगर राज्य सरकारें इस बीमारी से निपटने का इंतजाम नहीं करतीं तो स्थिति और भी बिगड़ सकती है.

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