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ग़रीब अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृत्ति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में केंद्र सरकार अब अल्पसंख्यक समुदाय के ग़रीब छात्रों को उनकी प्रतिभा और ज़रूरत के आधार पर छात्रवृत्ति देने जा रही है. योजना के तहत हर वर्ष 20 हज़ार छात्रवृत्तियाँ दी जाएँगी. इस योजना को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के ज़रिए लागू किया जाएगा. गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने इस योजना को मंज़ूरी दी. बैठक के बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बताया कि यह छात्रवृत्ति अल्पसंख्यक समुदाय के ग़रीब छात्रों को ज़रूरत और प्रतिभा के आधार पर दी जाएगी. उन्होंने बताया, "इस छात्रवृत्ति से किसी भी सरकारी या मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थान से व्यावसायिक या तकनीकी शिक्षा में स्नातक या स्नातकोत्तर शिक्षा ली जा सकेगी." वित्त मंत्री ने कहा कि इस छात्रवृत्ति से अल्पसंख्यक समुदाय की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और इसका दूरगामी परिणाम यह होगा कि अल्पसंख्यक समुदाय देश के आर्थिक विकास में योगदान दे सकेंगे. सहायता मंत्रिमंडलीय समिति ने इस योजना के लिए ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में हर वर्ष 761.69 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान करने को मंज़ूरी दी है. जानकारों का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय को आरक्षण न मिल पाने की सूरत में ऐसी योजनाओं से बड़ी सहायता मिल सकती है. हालाँकि वे मानते हैं कि इसको लेकर यह सवाल खड़ा हो सकता है कि अल्पसंख्यक समुदाय के ग़रीबों को जिस आधार पर छात्रवृत्ति दी जा सकती है उसी आधार पर बहुसंख्यक समुदाय के ग़रीब छात्रों को यही सुविधा क्यों नहीं दी जा सकती. उधर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि ग़रीबों के बीच जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और सरकार को चाहिए कि वह सभी धर्म और जाति के ग़रीबों के लिए ऐसी ही योजना लागू करे. ‘अच्छा क़दम’ सुपरिचित समाजशास्त्री इम्तियाज़ अहमद का कहना है कि जो आँकड़े सच्चर समिति ने दिए थे उसमें कहा गया था कि स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर मुसलमान छात्रों की संख्या बहुत कम है. उन्होंने इसका एक कारण तो यह भी बताया था कि वे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में भी कम जाते हैं.
उन्होंने बताया कि कि सच्चर समिति ने अनुशंसा की थी कि इन छात्रों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए. उनकी राय में मुसलमान समूहों को आरक्षण देने की बजाय उनके लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान कर दिया गया है. इससे आरक्षण का झगड़ा भी पैदा नहीं होगा. लेकिन इसके बाद इसकी संभावना भी है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की ओर से भी इस तरह की सहायता की माँग उठेगी और सरकार को चाहिए कि वह इसके बारे में विचार करे और कोई योजना शुरू करे. इस सवाल पर कि क्या वित्त मंत्री के बयान से नहीं लगता कि आर्थिक विकास में अल्पसंख्यकों की भागीदारी नहीं है, इम्तियाज़ अहमद ने कहा कि यह बात एक हद तक सही है कि मुसलमानों की आर्थिक विकास में वैसी भागीदारी नहीं है जैसी हो सकती है. उनका कहना है कि यदि मुसलमान शिक्षा पा जाएँ तो वे आर्थिक विकास में ज़ोरदार ढंग से योगदान दे सकेंगे. 'तुष्टिकरण' लेकिन भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने सरकार के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि ग़रीब चाहे किसी भी मज़हब के हों, उनमें भेदभाव नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा, "यह भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्षता के तत्व के ख़िलाफ़ है और इससे अनावश्यक असंतोष पैदा होगा. सरकार का यह निर्णय तुष्टिकरण की नीति का परिणाम है." जावड़ेकर ने कहा कि हालांकि यह योजना अच्छी है लेकिन जाति-धर्म को आधार बनाए बिना सभी ग़रीबों के लिए इस योजना को लागू करना चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें अल्पसंख्यक न मानने के फ़ैसले पर रोक06 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस मुसलमानों और ईसाइयों के लिए आरक्षण05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस हाइकोर्ट के फ़ैसले पर प्रतिक्रियाएँ05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय नहीं'05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'ग्रामीण भारत में ईसाई बेरोज़गार अधिक'30 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस 'मुसलमानों के लिए ख़ास योजनाएँ हों'07 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'मुसलमानों के लिए ख़ास कार्यक्रम हों'07 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस मनमोहन सिंह के बयान से उठा विवाद 10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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