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भारत का बहुत कुछ है दाँव पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक कारणों से भारत और अफ़ग़ानिस्तान के हित जुड़े हुए हैं. लगभग तीस साल की जंग से उबरते अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए भारत आने वाले तीन सालों में 75 करोड़ डॉलर खर्च कर रहा है. कई सरकारी और निजी कंपनियाँ अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. सैंकड़ों भारतीय कर्मचारी यहाँ काम कर रहे हैं. लेकिन पिछले दो सालों में तालेबान और अल क़ायदा के हमले बढ़े हैं और स्थिति ख़तरनाक होती गई है. हर भारतीय अफ़ग़ानिस्तान में ख़तरे से वाक़िफ़ है. लेकिन इस बारे में खुल कर नहीं बोलते. अनौपचारिक बातचीत में सभी ने डर की बात स्वीकार की लेकिन माइक्रोफ़ोन के सामने में ऐसा कुछ भी नहीं कहते. आंध्र प्रदेश से आए गंगाधर एस्टर टेलिकॉम कंपनी में काम करते हैं. उन्होंने बताया, "अफ़ग़ानिस्तान के कई इलाक़े मुझे मेरे गाँव जैसे लगते हैं. मेरे लिए यहाँ कोई परेशानी नहीं है. दरअसल भारत में जितने मेरे दोस्त हैं उससे ज़्यादा अफ़ग़ानिस्तान में हैं." ना जाने क्या वजह है कि आदमी यहाँ छाती ठोक कर यह भी नहीं कह सकता कि उसे जान का डर है. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में टेलफ़ोन और सैटलाइट टीवी की लाइनें बिछाने वाली भारतीय कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर मधु भाई का कहना है हालात तालेबान के शासन के समय से ज़्यादा ख़राब हैं. उन्होंने बताया, "पहले 2001 में जब हमारी कंपनी ने यहाँ काम शुरु किया था तो बाहरी प्रांतों में जाने में ख़तरा महसूस होता था. लेकिन हाल के बम हमलों के बाद तो काबुल में घूमने में भी डर लगता है." ख़तरा जहाँ पिछले डेढ़ साल में डेढ़ सौ से ज़्यादा बम हमले हो चुके हों, जहाँ आम तौर पर विदेशियों को निशाना बनाया जा रहा हो वहाँ दूर दराज़ के इलाक़ों में सड़क निर्माण या बिजली परियोजना से जुड़े लोग जो खुले में काम करते हैं उनके लिए ख़तरा तो है.
तो क्या इन भारतियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा मौजूद है. सड़क निर्माण में लगी एक भारतीय कंपनी बीसीईसी के एक वरिष्ठ अधिकारी राजीव वधावन कहते हैं कि उनके मज़दूरों और इंजीनियरों के सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा गार्ड हैं और सुरक्षा उनके लिए कोई मसला नहीं है. यह कंपनी अफ़गा़निस्तान में साढे पांच सौ किलोमीटर लंबी सड़कें बना रही है. मगर एस्टर के प्रोजेक्ट मैनेजर मधुभाई की सोच अलग है. वो कहते हैं जितनी ज़्यादा सुरक्षा हो ख़तरा उतना ही बढ़ता है. लेकिन ख़तरे के लगातार मँडराते साये के बावजूद अगर काबुल में भारतीय दूतावास के अधिकारियों से बात करें तो लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के प्रति अपने संकल्प पर अडिग है. भारत यहाँ हर सूरत में अपने कदम मज़बूत रखना चाहता है. काबुल में भारतीय दूतावास में मंत्री संदीप कुमार बताते हैं कि ढांचागत निर्माण हो या स्वास्थ्य सेवाएँ या तकनीकी सुविधाओँ का निर्माण हो- भारत यहाँ हर क्षेत्र में योगदान दे रहा है. वे कहते हैं कि भारत सालाना 500 अफ़ग़ान छात्रों और पाँच सौ कर्मचारियों को भारत में प्रशिक्षण के लिए छात्रवृतियाँ दे रहा है. उन्होंने बताया, "बुनियादी सेवा के क्षेत्र में भारत का एक सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है ज़रांज-देलाराम सड़क निर्माण. यह 218 किलोमीटर लंबी सड़क ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को जोड़ेगी जिससे अफ़ग़ानिस्तान में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी. भारत यहाँ अस्पताल बना रहा है, स्कूल खोलने में मदद कर रहा है. भारत की कंपनियाँ यहाँ बिजली और टेलीफ़ोन की लाइनें बिछा रही है. और भारत जो भी मदद दे रहा है वो अफ़ग़ानिस्तान सरकार के साथ विचार-विमर्श के बाद दे रहा है." अफ़ग़ानिस्तान में करज़ई सरकार के बनने के बाद से अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंध कड़वे होते गए हैं और अफ़ग़ानिस्तान में भारत की बढ़ती हुई पैठ पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय हो सकती है. ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को जोडने वाली ज़रांग-देलाराम सड़क जिसका भारत निर्माण कर रहा है उससे पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान की निर्भरता कम हो सकती है. तो क्या कुछ ताकतें इस सड़क को निशाना बना सकती हैं. क्षेत्रीय सहयोग अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत राकेश सूद कहते हैं, "मुझे लगता है कि क्षेत्रीय सहयोग से सभी को फ़ायदा होगा. पाकिस्तान सरकार चाहे जो कहे, कई पाकिस्तानी कंपनियाँ भी भारतीय कंपनियों के साथ मिल कर साझा व्यापार करना चाहती हैं. और जल्द ही हो सकता है मध्य एशिया में भारत और पाकिस्तान की कंपनियाँ भागीदारी में व्यवसाय कर रही होंगी."
राकेश सूद यह भी स्वीकार करते हैं कि इस सड़क निर्माण के लिए काम करने वाले भारतियों की सुरक्षा के लिए अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के साथ-साथ इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस की टुकड़ियाँ भी तैनात की गई हैं. बात सिर्फ़ राजनीतिक या कूटनीतिक संघर्ष की नहीं बल्कि आर्थिक होड़ की भी है क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण का काम अरबों डॉलर का खेल है और सरकारी और निजी विदेशी कंपनियों के लिए यह बहुत बड़ी मंडी है. भारतीय राजदूत राकेश सूद कहते हैं कि कई भारतीय निजी कंपनियाँ विश्व बैंक और एशियन विकास बैंक की परियोजनाओं को पूरा कर रही हैं और उन्हें इस दौड़ से कोई बाहर नहीं कर सकता. एस्टर टेलिकॉम कंपनी के अफ़ग़ान साझेदार हाजी हज़रत शाह महमूदी कहते हैं कि उनकी कंपनी और उसमें काम करने वाले भारतीय चुनौतियों को ख़ूब समझते हैं. उन्होंने कहा, "अफ़ग़ान समझते हैं कि हमारी कंपनी के काम से उन्हें फ़ायदा होगा, सुविधाएं मिलेंगी. वो जानते हैं कि यह कोई सरकारी काम नहीं है. हम आम लोगों से और उनके क्षेत्रीय नेताओं से संपर्क बनाए रखते हैं. दक्षिण के कई इलाक़ों में ख़तरा ज़रूर है. हमारे इंजीनियरों के लिए वहाँ जाने में कुछ परेशानियाँ भी हैं लेकिन हम काम बंद नहीं करेंगे. हम इस जोखिम के लिए तैयार हैं." एक नए खुलते बाज़ार में अपनी जगह बढ़ाने के लिए ऐसी कई कंपनियाँ हमलों के जोखिम को तौल कर आगे बढ रही हैं और इन्हें आगे बढाने वाले आम मज़दूरों और इंजीनियरों का एक मात्र सुरक्षा कवच है एहतियात. |
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