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'गुलिस्ताँ' की पांडुलिपि उड़ाने वाले पकड़े गए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सात महीने की कड़ी मशक्कत के बाद बिहार में गया पुलिस ने 'गुलिस्ताँ' की उस पांडुलिपि के कुछ हिस्से बरामद कर लिए हैं, जिसे मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने लिखा था. फ़ारसी साहित्य की महानतम रचनाओं में गिने जाने वाले 'गुलिस्ताँ' की पांडुलिपि पिछले वर्ष 10 दिसंबर को गया के टिकारी राज उच्च विद्यालय के लॉकर से चोरी हो गई थी. सोने के वर्क़ से सजाई गई इस दुर्लभ पांडुलिपि की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमत एक करोड़ रुपए बताई जा रही है. ईरान के महान दार्शनिक शेख़ सादी शीराज़ी की मौलिक रचना 'गुलिस्ताँ' की प्रतिलिपि औरंगज़ेब ने अपने हाथों से तैयार की थी. औरंगज़ेब को किताबों की प्रतियाँ बनाने यानी किताबत करने का शौक़ था, उन्होंने क़ुरान सहित कई प्रमुख ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार की थीं. इतिहासकारों का कहना है कि औरंगज़ेब किताबत और टोपी सिलने जैसे कामों की आमदनी से अपना निजी ख़र्च चलाते थे. गिरफ़्तारी पुलिस ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में ग्राहक बन कर तीन व्यक्तियों के क़ब्ज़े से पांडुलिपि के हिस्से बरामद किए. इस मिशन में पुलिस ने रामरत्न यादव, बजरंगी सिंह और राजेश कुमार को एक स्थानीय होटल से गिरफ़्तार किया है.
पुलिस को संदेह है कि इस पांडुलिपि को यूरोप पहुँचाए जाने की कोशिश की जा रही थी. पुलिस फ़िलहाल यह बताने की स्थिति में नहीं है कि 'गुलिस्ताँ' के बाक़ी 90 पन्ने भारत में ही हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय गिरोह तक पहुँच चुके हैं. गया के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार जैन ने बताया, '' हमें सूचना मिली थी कि ये लोग पांडुलिपि को 20 लाख रुपये में कोलकाता के एक अंतरराष्ट्रीय तस्कर को बेचने की बात तय कर चुके हैं. पुलिस की टीम सादे लिबास में पहुँची और उसने इसकी बोली 50 लाख रुपए लगाई. जैसे ही बात तय हो गई, पुलिस ने पांडुलिपि समेत तीनों अपराधियों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.'' जैन ने बताया कि इस मामले में सरगना ज्योति अब भी फ़रार है और उसे पकड़ने के प्रयास जारी हैं. पुलिस पकड़े गए लोगों से और सुराग लेने की कोशिश कर रही है. ज्योति टिकारी के उसी स्कूल का छात्र रहा है जहाँ से पांडुलिपि चोरी हो गई थी. पुलिस का कहना है कि इस चोरी में शामिल लोगों ने पांडुलिपि के कई हिस्सों में कर आपस में बाँट लिया था जिसके कारण सभी पन्ने बरामद नहीं हो सके हैं. इतनी दुर्लभ पांडुलिपि सकूल को कैसे हाथ लगी, इस बारे में स्थानीय लोगों की अलग-अलग राय है. कुछ लोगों का कहना है कि अलवर के महाराजा ने इस पांडुलिपि को टिकारी के महाराजा से 10 हज़ार रुपये में बेचा था जिसे उन्होंने टिकारी पुस्तकालय को वर्ष 1876 में दे दिया था. यह पुस्तकालय अब टिकारी राज उच्चविद्यालय का हिस्सा है. एक और कहानी के मुताबिक़ ख़ुद औरंगज़ेब ने ही टिकारी के महाराजा के पूर्वजों को इसे उपहार में दे दिया था. | इससे जुड़ी ख़बरें बारहवीं शताब्दी में बुद्ध के भित्ति-चित्र05 मई, 2007 | भारत और पड़ोस भारतीय वर्णमाला08 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस प्राचीन पांडुलिपि का डिजिटलीकरण17 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस उर्दू में छपी रामायणों का ज़ख़ीरा10 दिसंबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस गुरु ग्रंथ साहिब की प्राचीन प्रति23 सितंबर, 2002 | पहला पन्ना प्राचीन ग्रंथ से मिले नुस्ख़े14 मई, 2002 | पहला पन्ना मिथकों में रचा-बसा टिंबकटू 16 अप्रैल, 2002 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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