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गुरुवार, 14 जून, 2007 को 12:28 GMT तक के समाचार
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जगदीश बारह वर्ष बाद लौटा रफ़ीक बनकर

जगदीश पत्थर तराशने का काम करते थे
कल्पना के घर में ख़ुशियाँ वापस आ गई हैं.

उनके पति जगदीश पाकिस्तानी जेल में 12 वर्ष गुज़ारकर लौटे हैं.

कटिहार के आज़मनगर प्रखंड के कुँआतारी गाँव में पिछले कुछ दिनों से 42 वर्षीय जगदीश कर्मकार लोगों के लिए कौतूहल का विषय बने हुए हैं.

जब वे अपनी रामकहानी ग्रामीणों को सुनाते हैं तो बग़ल में बैठी उनकी पत्नी की आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं लेते.

तेरह वर्ष पहले घर से निकले उनके पति जगदीश कर्मकार जब वापस घर आए तो वे मोहम्मद रफ़ीक़ बन चुके थे.

जब जगदीश ने बताया कि उन्हें पाकिस्तान में मुसलमान बना दिया गया था तो उनकी पत्नी और ग्रामीणों ने सबसे पहले उन्हें स्थानीय गोरखनाथ मंदिर में ले जाकर उन्हें "दोबारा हिंदू बनवाया."

ख़ुशी

38 वर्षीय कल्पना कहती हैं, “मैंने सीता की तरह अपने पति के लिए तपस्या की है. मुझे यक़ीन था कि मेरे पति एक दिन ज़रूर आएँगे इसलिए मैंने सिंदूर लगाना कभी नहीं छोड़ा जबकि कुछ महिलाएँ कहती थीं कि मेरा पति कभी नहीं लौटेगा क्योंकि वह या तो मर गया है या दूसरी शादी कर चुका है. मैंने इस लंबी अवधि में काफ़ी कष्ट सहे हैं. अब मैं बहुत ख़ुश हूँ.”

वहाँ मुझे नमाज़ अदा करने के लिए कहा गया तो मैं फँस गया. उसके बाद मुझे धोखेबाज़ कहा गया और मेरी पिटाई का सिलसिला शुरू हुआ. इसका असर यह हुआ कि बारह साल के लंबे समय ने मुझे तमाम इस्लामी तौर-तरीक़े सिखा दिए
जगदीश कर्मकार

जगदीश कहते हैं, "मैं 1994 में रोज़ी-रोटी की तलाश में राजस्थान के मकराना में पत्थर तराशने के काम के लिए गया था पर क़िस्मत ने पाकिस्तान की लाड़काना जेल में पहुँचा दिया.”

अनपढ़ जगदीश कहते हैं कि जब वे बाड़मेर पहुँचे तो वहाँ वे अब्दुल रहमान नामक एक बड़े व्यवसायी के संपर्क में आए. जो उन्हें वहाँ से मकराना ले गया.

पेशे से लुहार जगदीश जल्द ही संगमरमर तराशी के काम में माहिर हो गए और साथ ही उन्होंने अब्दुल रहमान का विश्वास भी हासिल कर लिया.

जगदीश कहते हैं, “बाद में अब्दुल ने मेरे ऊपर पत्थरों की सप्लाई करने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. मुझे भारत और पाकिस्तान की सीमा के बारे में कुछ पता नहीं था. एक दिन मैं अचानक पाकिस्तानी पुलिस के हाथों पड़ गया और मुझे बताया गया कि मैंने ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश किया है. मुझे जेल में डाल दिया गया."

वापसी

जगदीश ने कहा, “अब्दुल ने मुझे समझा रखा था कि कोई पूछे तो मैं अपना नाम मोहम्मद रफ़ीक़ बताऊँ तो मुझे कोई कुछ नहीं करेगा. लेकिन यह नाम मेरे लिए मददगार साबित नहीं हुआ. वहाँ मुझे नमाज़ अदा करने के लिए कहा गया तो मैं फँस गया. उसके बाद मुझे धोखेबाज़ कहा गया और मेरी पिटाई का सिलसिला शुरू हुआ. इसका असर यह हुआ कि बारह साल के लंबे समय ने मुझे तमाम इस्लामी तौर-तरीक़े सिखा दिए.”

कल्पना ने तेरह वर्ष तक पति का इंतज़ार किया

जगदीश पाकिस्तानी जेल में बिताए अपने दिनों के बारे में कहते हैं कि एक-दो सालों तक उन पर काफ़ी ज़्यादती की गई. लेकिन कुछ दिनों के बाद सब कुछ सामान्य हो गया. वे रोज़े-नमाज़ के पाबंद हो गए और एक आम मुसलमान की ज़िंदगी जीने लगे.

जगदीश तमाम कष्टों के बावजूद अब्दुल का एहसान नहीं भूलते. वे कहते हैं कि अगर मैं जेल में अब्दुल की वजह से गया तो वहाँ से वापस भी उसी के प्रयासों से आया.

वे कहते हैं, “मैं एक अनपढ़ आदमी हूँ मुझे नहीं मालूम कि मुझे किस क़ानूनी प्रक्रिया के तहत और कैसे छोड़ा गया पर अबदुल ने इसके लिए बहुत कोशिश की. मैं जब रिहा हुआ तो मुझे मकराना स्थित अब्दुल के कारख़ाने पर पहुँचा दिया गया. तब उसने मुझे सात सौ रुपये दिये और मैं अपने घर चला आया.”

कटिहार के पुलिस अधीक्षक अनिल किशोर यादव कहते हैं कि आधिकारिक तौर पर उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है लेकिन पहले भी इस तरह के कई मामले आए हैं जिसमें अनके भारतीय बंदी पाकिस्तान की जेलों में लंबा समय बिताकर अपने घर लौटे हैं.

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