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उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है अभी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुमन पुरोहित और उनके 13 सहयोगियों के लिए यह काम किसी समुंदर में कोई चीज़ की तलाश करने जैसा है क्योंकि वे पाकिस्तान की सभी जेलों में अपने उन संबंधियों को ढूंढ रहे हैं जो 1971 के युद्ध में लापता हो गए थे. उन्हें उम्मीद है कि भारत पाकिस्तान के बीच हुई उस लड़ाई में लापता हुए उनके संबंधी शायद पाकिस्तानी सेना के हाथों गिरफ़्तार हो गए होंगे और हो सकता है कि वे पाकिस्तान की किसी जेल में रखे गए हों. सुमन पुरोहित कहती हैं, "हमारी शादी को 18 महीने ही हुए थे और हमारा बेटा विपुल उस समय तीन महीने का था जब भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 की लड़ाई शुरू हो गई थी." सुमन पुरोहित के पति फ्लाइट लैफ़्टिनेंट मनोहर पुरोहित ने बांग्लादेश में कुछ उड़ानें भरी थीं. उस समय उस इलाक़े को पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था. मनोहर पुरोहित कुछ उड़ानें भरने के बाद तो कुछ दिन के लिए घर भी आ गए थे. सुमन पुरोहित बताती हैं, "युद्ध शुरू होने के पाँचवें दिन नौ दिसंबर उन्होंने राजस्थान सैक्टर से पश्चिमी पाकिस्तान के लिए उड़ान भरी थी लेकिन उसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटे." सुमन पुरोहित बताती हैं कि उस समय उनकी उम्र 23 वर्ष थी और अब वह 59 वर्ष की हो चुकी हैं. 36 साल तक वह बस इसी तलाश में लगी रहीं कि कहीं से उनके पति के बारे में कोई सुराग़ मिल जाए और वह हर छोटे-बड़े सुराग़ के पीछे भागती रहीं, इस उम्मीद में कि किसी दिन का सूरज उनके पति के बारे में कोई अच्छी ख़बर ले आए. भारत के 53 रक्षाकर्मियों के संबंधी भी सुमन पुरोहित की ही तरह इस तलाश में लगे हैं कि 1971 की लड़ाई में लापता हुए उनके संबंधियों के बारे में कुछ पता लग सके. उधर पाकिस्तान का कहना है कि उसके पास अब भारत के कोई भी युद्धक़ैदी नहीं बचे हैं लेकिन वह भारतीय परिजनों को अपनी सभी जेलें देखाने के लिए तैयार हो गया है और ऐसा दोनों देशों के बीच चल रहे शांति प्रयासों के तहत किया गया है.
लेकिन भारतीय परिजनों की शिकायत है कि उन्हें बैरकों में जाने की खुली इजाज़त नहीं दी गई है बल्कि क़ैदियों को ही उनके सामने पेश किया गया है और उनमें से एक भी 1971 की लड़ाई का युद्धबंदी नहीं है, हालाँकि उन्हें जेल रिकॉर्ड दिखाया गया है मगर वे रिकॉर्ड उर्दू में लिखे हुए हैं जिन्हें कोई भी परिजन नहीं पढ़ सकता. सुराग़ मिले तो... उन सभी लोगों को "लड़ाई के दौरान लापता" की श्रेणी में रखा गया था और उन्हें भारत या पाकिस्तान ने कभी भी युद्धबंदी का दर्जा नहीं दिया. मुंबई में एक कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजेश कौरा कहते हैं, "हममें से ज़्यादातर ने सोचा कि उनकी मौत हो चुकी है लेकिन उनकी जीवित होने के भी सुराग़ मिले जिससे हमारी उम्मीदें बनी रहीं." राजेश कौरा बताते हैं कि उनके भाई रविंदर कौरा को पाकिस्तानी सेनाओं ने पश्चिमी पाकिस्तान में एक निगरानी चौकी से पकड़ लिया था. उसका वायरलैस ऑपरेटर वहाँ से भाग निकला और उसी ने रविंदर को पकड़े जाने के बारे में परिवार को सूचना दी. उसके बाद भी अनेक ऐसे सुराग़ मिले जिनसे रविंदर कौरा के जीवित होने की उम्मीद पक्की नज़र आती रही. पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान ने अनेक भारतीयों को रिहा किया है उनमें से कुछ ने कहा है कि उन्होंने रविंदर कौरा को किसी ने किसी जेल में देखा था. सरकारों पर दबाव योगा के एक विशेषज्ञ डॉक्टर राम स्वरूप सूरी का बेटा भी 1971 की लड़ाई के दौरान लापता हो गया था. उन्होंने लापता हुए 40 लोगों के परिजनों के पते-ठिकाने इकट्ठे किए और उन सभी से संपर्क करके एकजुट किया. उन परिवारों को एक जुट करने के इस अभियान में सूरी को तीन दशक का समय लग गया.
चंडीगढ़ में मानव संसाधन के व्यवसाय में लगे जीएस गिल का कहना था, "डॉक्टर राम स्वरूप सूरी ने मेरी भाभी को भी पत्र लिखा और इस तरह हम उन लोगों के साथ एकजुट हो सके जिनके संबंधी लापता हुए थे." जीएस गिल के भाई विंग कमांडर हरसरन सिंह गिल उस समय भारतीय वायु सेना में सेवारत थे और उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान के लिए उड़ान भरी थी. वहाँ उनके सहयोगियों ने बताया कि उनका विमान ज़मीन से टकराने से पहले गिल उससे निकल आए थे. जीएस गिल बताते हैं कि भाई के बारे में पता लगाने का संघर्ष काफ़ी लंबा और तकलीफ़ वाला रहा है. गिल बताते हैं, "पाकिस्तान ने जिन भी भारतीय लोगों को रिहा किया है, हमने उन सभी से मुलाक़ात की है. हम भारत सरकार पर दबाव डालते रहे हैं कि वह इस मामले में हमारी मदद करे और किसी भी तरह की प्रगति के बारे में हम सभी एक दूसरे को सूचित करते रहे हैं." दमयंती वी थम्बे की कहानी भी कुछ कम दर्दनाक नहीं है. वह अपने पति फ्लाइट लैफ्टिनेंट वीवी थम्बे के लौटने की अब भी आस लगाए हुए हैं. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में खेल निदेशक दमयंती कहती हैं, "हमारे सुराग़ एक सिरे से शुरू होकर दूसरे सिरे तक पहुँचते हैं लेकिन फिर लौटकर वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ से शुरू होते हैं. हम भारत सरकार को लिखते रहे हैं और वह पाकिस्तान को लिखते हैं और अंत में वे हम से ही कहते हैं कि हम उन्हें और सबूत उपलब्ध कराएँ." 1971 के यु्द्ध के समय दमयंती की शादी को सिर्फ़ एक साल हुआ था जब उनके पति का विमान पश्चिमी पाकिस्तान में हमले का शिकार हो गया था.
पाकिस्तान का कहना है कि अब उसकी जेलों में 1971 का कोई युद्धबंदी नहीं है लेकिन भारत के ये परिजन इससे संतुष्ट नहीं है. जीएस गिल का कहना है, "हो सकता है कि उनमें से कुछ ने अपनी पहचान छुपाई हुई हो और यह भी हो सकता है कि उन्हें जासूसी के आरोपों में जेल में रखा हो. शायद वे मानसिक शरण में हों या फिर किसी ऐटक फ़ोर्ट जैसे किसी सैन्य ठिकाने पर. हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं है. सिर्फ़ पाकिस्तान सरकार ही हमारी मदद कर सकती है." चंडीगढ़ के डॉक्टर सिम्मी वराइच अपने पिता मेजर एसपीएस वराइच के वापिस लौटने की आस लगाए हुए हैं. उनका कहना है, "किसी भी तरह की सज़ा की अवधि 36 वर्ष होती है और उसमें जासूसी के आरोपों में हुई सज़ा भी शामिल है. बहरहाल जो भी मामला रहा हो, हमें इस बारे में सूचित तो किया जाना चाहिए." लेकिन पाकिस्तान में कम ही लोग ऐसे हैं जो इन भारतीय परिवारों की उम्मीद में जान डाल सकते हैं. भारतीय परिवारों ने लाहौर और कराची की दो जेलों का दौरा किया है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है. वे सिंध और पंजाब प्रांतों में आठ और जेलों में देखने जाएंगे और हो सकता है कि इसमें उन्हें कई वर्षों का समय लग जाए. अनेक संबंधियों के लिए यह बहुत तकलीफ़ वाला काम होगा. सुमन पुरोहित कहती हैं, "मुझे बड़ी उम्मीद थी कि मेरे पति लाहौर जेल में मिल जाएंगे लेकिन उस जेल में उन्हें देखे बिना लौटना बहुत निराशाजनक और दर्दनाक अनुभव था लेकिन में आशा की डोर नहीं छोड़ी है और इसी डोर से मुझे ताक़त भी मिल रही है कि एक दिन वो मुझे मिल जाएंगे." यह कहते हुए सुमन पुरोहित की आँखें नम तो हो जाती हैं लेकिन उनके चेहरे पर उम्मीद की मज़बूती भी नज़र आती है. | इससे जुड़ी ख़बरें पहले दिन निराश लौटे सैनिकों के परिजन02 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 54 साल बाद रिहा हुए मचांग25 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस तीन पाकिस्तानी क़ैदी भूख हड़ताल पर 02 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस पाकिस्तानी क़ैदियों की उम्मीद नहीं टूटी है13 अक्तूबर, 2003 को | भारत और पड़ोस आख़िर घर वापसी हुई | भारत और पड़ोस पाकिस्तानी बंदियों को आशा | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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