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शुक्रवार, 02 जुलाई, 2004 को 17:29 GMT तक के समाचार
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तीन पाकिस्तानी क़ैदी भूख हड़ताल पर
मोहम्मद बाबर और मंजूर अहमद
ये बंदी पिछले दस दिन से भूख हड़ताल पर हैं
भारत-पाकिस्तान रिश्तों में जमी बर्फ़ धीरे-धीरे बिघल रही है.

लेकिन दोनो देशों की जेलों में एक-दूसरे देश के जो नागरिक कैद हैं उनकी ज़िदगी अब भी दुश्वार बनी हुई है.

राजस्थान की जेलों में सालों-साल गुज़ार चुके तीन पाकिस्तानी बंदी पिछले दस दिन से भूख हड़ताल पर हैं और माँग कर रहे हैं कि उन्हें जयपुर के सरकारी हस्पताल में दाख़िल करवाया जाए.

पाकिस्तान के मोहम्मद बाबर हों या फिर मोहम्मद अज़ीम, वे दोनो देशों के बीच लंबे समय तक बनी रही कड़वाहट का प्रतिबिंब हैं.

जासूसी जैसे संगीन आरोपों में भारतीय जेलों में अपनी जवानी गुज़ार चुके इन पाकिस्तानी नागरिकों की सज़ा की मयाद बहुत साल पहले ही पूरी हो चुकी है लेकिन इनकी घर वापसी बहुत दूर है.

इन बंदियों की पुकार पर सुप्रीम कोर्ट इनकी रिहाई का आदेश भी दे चुका है.

मोहम्मद अज़ीम
इन बंदियों की जेल की मयाद बहुत पहले ही पूरी हो चुकी है

तब से उन्हें अलवर में खुले शिविर में रखा जा रहा है. शुरु में वहाँ तेरह बंदी थे जिनमें से आठ रिहा होकर अपने घर पहुँच चुके हैं.

कैदियों में से एक लाहौर संतनगर के मोहम्मद बाबर गत पंद्रह साल से जेल में बंद हैं.

उनका कहना है,"मुझे मालूम नहीं कि रिहाई का मामला आख़िर कहाँ अटका है. मैं तीसरी बार भूख हड़ताल कर रहा हूँ."

उनके घर वाले बाबर के नाम-पते की तस्दीक कर दोनो देशों की सरकारों को सूचित कर चुके हैं. बाबर भी लगातार मानवाधिकार आयोग को लिखते रहते हैं.

जेल में बीस साल गुज़ार चुके फ़ैसलाबाद के सत्तर वर्षीय मोहम्मद अज़ीम अपने घर-परिवार को याद कर भावुक हो उठते हैं.

उन्हें तीन साल की सज़ा हुई थी जो बहुत पहले ही पूरी हो चुकी है. अज़ीम की ज़िंदगी की शाम ढलने को है.

उनसे बात करने पर उनका गला भर आया और आँसू छलकने लगे. वे बोले, "भाई हमाली उम्र का तो ख़्याल करों. ज़िंदगी के जो दो चार साल बचे हैं वो तो मुझे रिश्तेदारों के बीच गुज़ारने दो. ग़लती की तो सज़ा भी भुगत चुके हैं."

हारूनाबाद के मंजूर अहमद कि वे दो दशक भारतीय जेलों में गुज़ार चुके हैं. जोधपुर हाई कोर्ट 1995
में उनकी रिहाई का आदेश दे चुका है पर मंज़िल अभी दूर है.

राज्य के गृह मंत्री गुलाबचंद ने बीबीसी को बताया, "ये मामला केंद्र सरकार से संबंधित है. उनके आदेशों का पालन करते हुए ही तो हमने इन कैदियों को खुले शिविर में रखा है. क्योंकि ये केंद्र सरकार के अधिकार का विषय है इसलिए राज्य सरकार इस विषय में कुछ नहीं कर सकती. "

यदि भारतीय जेलों में पाकिस्तानी कैदी परेशान हैं तो सहहद के उस पार पाकिस्तानी जेलों में भी कई भारतीय बंदियों की सिस्कियाँ सुनाई देती हैं.

भारत और पाकिस्तान की सरकारों की कूटनीति में ऐसी मानवीय संवेदनाओं की कोई जगह नज़र नहीं आती.

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