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रविवार, 10 जून, 2007 को 13:36 GMT तक के समाचार
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दूर-दूर तक जाते हैं मूसापुर के 'हुनरमंद'

बिहार के नौजवानों की तरह नहीं हैं इस गाँव के युवा
'यहाँ जेबतराशी, राहज़नी और उठाईगिरी की तसल्लीबख़्श ट्रेनिंग दी जाती है.'

ऐसा कोई बोर्ड तो नहीं लगा है लेकिन बिहार के कटिहार ज़िले के मूसापुर गाँव को लोग चोरों के प्रशिक्षण शिविर के तौर पर ही जानते हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस गाँव में एक कमेटी भी है जो क़ानून की पकड़ में उलझे चोरों को सज़ा से बचाने का हरसंभव प्रयास करती है. इस कमेटी को चोरों की कमाई का एक हिस्सा चंदे के रूप में दिया जाता है.

मूसापुर की किच्चट टोली में अधिकतर घरों में एसी और चमचमाती महँगी गाड़ियों के अलावा रईसों का खेल समझा जाने वाला बिलियर्ड्स युवाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल है.

स्थानीय कोढा थाना के प्रभारी बैजनाथ सिंह कहते हैं, "ये लोग आसपास नहीं बल्कि दिल्ली, मुंबई, आगरा, लुधियाना, कोलकाता समेत अनेक बड़े शहरों में सक्रिय हैं और पकड़े जाने पर अपना सही नाम पता नहीं देते इसलिए बच जाते हैं."

इसी गाँव के रमेश कुमार ने एक महँगा विदेशी वीडियो कैमरा सिर्फ़ एक-चौथाई क़ीमत पर बेचने का प्रस्ताव मेरे सामने रखा.

बेबस पुलिस
 हम किस-किस का नाम लें. सब तो यहाँ चोर ही हैं पर सही नाम-पता और सबूतों के अभाव में कोई कार्रवाई करना मुश्किल है
स्थानीय थाना प्रभारी

रमेश ने बताया, "हमारे प्रशिक्षण का पहला पाठ आठ-दस साल के बच्चों से शुरू होता है. हम उन्हें बेरहमी से मार खाने का आदी बनाते हैं ताकि पुलिस की लाठी का भी उन पर कोई असर न हो. फिर उसका कोई नया नाम रख दिया जाता है."

रमेश कहता है, "हमारी कोशिश होती है कि प्रशिक्षण के दौरान बच्चा ज़िद्दी और अड़ियल हो जाए. अधिकतर चोरी में इन्हीं बच्चों को मोहरा बनाया जाता है ताकि किसी को शक न हो."

थोड़ी देर बोलने के बाद रमेश सतर्क हो जाता है और आगे बताने से मना कर देता है.

ख़ानदानी पेशा

मूसापुर गाँव के 68 वर्षीय रामनारायण चौरसिया कहते हैं कि किच्चट बंजारे हैं जो 1960 के आस-पास तंबुओं में सड़क के किनारे आकर बसे थे.

किच्चट टोली में कई पक्के मकान दिखते हैं

पान की दुकान चलाने वाले चौरसिया कहते हैं, "मेरा जवान बेटा तीन महीने से लापता है. अब तक उसका पता नहीं चल सका है. मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है कि इसका इल्ज़ाम मैं किच्चट टोली के लोगों पर लगा सकूँ लेकिन मैं इतना कह दावे से कह सकता हूँ कि लूट और चोरी इनका ख़ानदानी पेशा है."

कोढा के थाना प्रभारी बैजनाथ सिंह कहते हैं, "हम किस-किस का नाम लें. सब तो यहाँ चोर ही हैं पर सही नाम-पता और सबूतों के अभाव में कोई कार्रवाई करना मुश्किल है."

इसी थाने के सहायक सब इंसपेक्टर रामाई सोरेन कहते हैं, "ये लोग छोटे से छोटे बच्चे को भी इस तरह प्रशिक्षित कर देते हैं कि हम पुलिस वाले उन से भी कोई सुराग़ नहीं ले पाते."

बदनामी
 आज किच्चट टोली हम लोगों के लिए बदनामी का कारण है. इसके लिए पुलिस भी ज़िम्मेदार है. पैसे के बूते पर ये लोग पुलिस का मुंह बंद रखते हैं
मोहम्मद सत्तार, मुखिया

एक स्थानीय दैनिक के पत्रकार सुमन कुमार ने कोई तीन वर्ष पहले किच्चट टोली के चोरों पर एक ख़बर लिखी थी. तब उन्हें बेरहमी से पीटा गया था.

सुमन कहते हैं, "हमने अपनी ख़बर में यह लिखा था कि किच्चट टोली के चोर अपने धंधे के लिए ख़ूबसूरत लड़कियों की मोहक अदा का भी सहारा लेते हैं. इसके बाद मेरे ऊपर हमला किया गया. मैंने तब स्थानीय थाने में मामला दर्ज कराया था."

मूसापुर के मुखिया मोहम्मद सत्तार कहते हैं, "आज किच्चट टोली हम लोगों के लिए बदनामी का कारण है. इसके लिए पुलिस भी ज़िम्मेदार है. पैसे के बूते पर ये लोग पुलिस का मुंह बंद रखते हैं."

दूसरी ओर, थाना प्रभारी इस बात से साफ़ इनकार करते हैं कि पुलिस उनसे साँठगाँठ रखती है. वे कहते हैं, "पिछले ही दिन मैंने शेखर बंजारा गिरोह के लोगों को गिरफ़्तार किया है."

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