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रविवार, 20 मई, 2007 को 13:39 GMT तक के समाचार
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पंजाब में डेरों का प्रभाव और राजनीति

डेरा सच्चा सौदा का गेट
डेरा सच्चा सौदा के सवा करोड़ से अधिक अनुयायी हैं
पंजाब में दलित और पिछड़ा वर्ग सामाजिक और राजनीतिक रूप से बिहार या उत्तर प्रदेश के मुक़ाबले कहीं पहले अपना प्रभाव क़ायम कर चुका था.

इसकी वजह ये है कि मध्यकाल में ही पंजाब में सिख धर्म के प्रभाव के कारण वर्ण व्यवस्था में काफ़ी हद तक समानता क़ायम होती दिखी.

चाहे ब्राह्मणों और राजपूतों ने सिख धर्म से दूरी बनाए रखी लेकिन जाट, पिछड़ी जातियों और दलितों ने बड़ी संख्या में सिख धर्म को अपनाया था.

लेकिन कुछ समय बाद सिख धर्म के अनुयायियों में अपनी ही तरह की जाति व्यवस्था क़ायम होने लगी और एक ऐसा वर्ग भी सामने आया जिसका धार्मिक और राजनीतिक मामलों में प्रभुत्व हो गया.

परंपरागत हो चुकी धर्म व्यवस्था में पहचान अब एक बड़ा मुद्दा बन चुका था. ऐसे में ग़रीब, कम प्रभावशाली जाट और दलित हाशिए पर पहुँच चुके थे.

हाशिए पर पहुँचे इन लोगों के नेतृत्व का ज़िम्मा प्रभावशाली 'गुरुओं' और संतों ने उठा लिया.

जैसे-जैसे इन 'गुरुओं' और संतों की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे उन्होंने ज़मीन ख़रीद कर अपने डेरे बना लिए.

पंजाब के दोआब इलाक़े में बाबा प्रेम सिंह का डेरा, पीर बुद्धू शाह का डेरा और मालवा इलाक़े से सटे हरियाणा के सिरसा ज़िले में डेरा सच्चा सौदा का आम लोगों में काफ़ी प्रभाव है.

इसके अलाव कुछ अन्य संप्रदाय ब्यास के राधास्वामियों और निरंकारियों का भी जनता के बीच काफ़ी प्रभाव है.

धर्म और राजनीति का घालमेल

ये संत और गुरु जनता के बीच सिख धर्म के प्रभाव को भली-भांति जानते हैं और यही कारण है कि ये लोग कई बार सिख और कई बार कुछ अन्य धर्मों की परंपराओं, धर्म-ग्रंथों, चिह्नों को अपना लेते हैं.

अपने समर्थकों में एक ही समुदाय के होने की भावना पैदा करने के लिए ये लंगरों का आयोजन करते हैं, जहाँ सभी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं और फिर साथ-साथ बर्तन भी साफ़ करते हैं.

एक साथ बैठकर सभी लोग भजन-कीर्तन करते हैं और डेरे के संत या प्रमुख उनके साथ सीधे वार्तालाप करते हैं.

 पंजाब में प्रजातांत्रिक राजनीति की जड़े मज़बूत होने के साथ ही डेरे स्थानीय सत्ता केंद्र बनकर उभरे. ऐसा राज्य जहाँ धर्म और राजनीति का घालमेल है हर राजनीतिक पार्टियों को डेरे और गुरु के प्रति 'निष्ठावान' वोटरों की बड़ी संख्या लुभाती रही है.

इन अधिकतर डेरों में गुरु या संत या प्रमुख ही सर्वे-सर्वा होता है और ज़्यादातर शिष्यों का समय और संपत्ति डेरा प्रमुख के इस्तेमाल के लिए हाज़िर रहता है.

पंजाब में प्रजातांत्रिक राजनीति की जड़े मज़बूत होने के साथ ही डेरे स्थानीय सत्ता केंद्र बनकर उभरे.

ऐसा राज्य जहाँ धर्म और राजनीति का घालमेल है, हर राजनीतिक पार्टियों को डेरों और 'गुरु' के प्रति 'निष्ठावान' वोटरों की बड़ी संख्या लुभाती रही है.

अकाली हालाँकि राजनीति पार्टी है लेकिन सिखों की धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी पर वर्ष 1930 से उसका नियंत्रण है.

सिख वोटरों से की गई अपील कभी भी धार्मिक रंग लिए बिना नहीं होती हैं और ऐसे में अकालियों की मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी डेरों के दरवाज़े पर पहुँचती है.

इस परिप्रेक्ष्य में इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि डेरे दो तरह के होते हैं. एक डेरे का नेतृत्व वे लोग करते हैं जो ख़ुद को संत कहते हैं और 'गुरु' की पदवी धारण किए बिना अपने आप को सिख धर्म के दायरे में रखते हैं. निहंग समूह इसी तरह के डेरे के तहत आते हैं.

दूसरी श्रेणी में 'सच्चा सौदा' जैसे डेरे हैं, जिनके अनुयायी सभी धर्मों के होते हैं और 'गुरु' धार्मिक रूप से सर्वेसर्वा होता है.

अकालियों को चुनौती

हालाँकि कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है लेकिन चुनावों के दौरान समर्थन जुटाने के लिए सामान्यत: अकालियों ने संतों का और कांग्रेस ने 'गुरुओं' का इस्तेमाल किया.

इसके बदले डेरा प्रमुखों ने राजनीतिक प्रभाव को अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने के साथ-साथ ताक़त और संपत्ति के प्रदर्शन के ज़रिए अधिक अनुयायी बनाने का साधन बना लिया.

ऐसे डेरे, जो सिख धर्म के दायरे में सीमित नहीं है और कथित रूप से कांग्रेस के साथ हैं, उनका जब सिख धर्मनिष्ठों के साथ टकराव शुरू हुआ तो असल समस्या शुरू हुई.

 डेरा प्रमुखों ने राजनीतिक प्रभाव को अपनी महत्वकांक्षा पूरी करने के साथ-साथ ताक़त और संपत्ति के प्रदर्शन के ज़रिए अधिक अनुयायी बनाने का साधन बना लिया.

अकालियों के लिए ये उनकी सत्ता को सीधी चुनौती थी और 'गुरुओं' का सिख धर्म के प्रतीकों को अपनाना रूढ़ीवादी सिखों के लिए ईश निंदा के समान.

कट्टरपंथी अकालियों और डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के बीच ताज़ा संघर्ष सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में निरंकारियों और सिखों के संघर्ष की याद दिलाता है.

हालाँकि, लंबे समय तक जारी रही हिंसा के दौर से आज की परिस्थितयाँ काफ़ी अलग हैं लेकिन ये न तो पहली बार है और न ही अंतिम बार जब पंजाब में कट्टरपंथी सिख और डेरा आमने-सामने हैं.

लब्बोलुआब ये है कि डेरा गुरुओं की निजी संपत्ति, महत्वकांक्षाओं, कांग्रेस से उनके 'गठज़ोड़' और सिख धर्म के 'रक्षकों' के धार्मिक सिखों की उम्मीदों पर खरा ना उतरने की वजह से पंजाब रह-रह कर सुलगता रहेगा.

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