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घुंघरू की झंकार पर मची तकरार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार की एक ज़िला परिषद की उपाध्यक्ष पूनम देवी जिन घुंघरुओं को अरसा पहले अपनी ज़िंदगी से निकाल चुकी थीं, उन्हें एक बार अपने पैरों में घुंघरू बाँधने पड़े हैं. कोठों की औरतों के लिए प्ररेणा बनने और उनके हक़ की लड़ाई को आगे बढ़ाने वाली पूनम देवी के इस फ़ैसले पर काफ़ी बवाल मचा हुआ है. बदनाम गलियों की जकड़न को तोड़ते हुए एक दशक पहले पूनम देवी ने कोठे को अलविदा कह दिया था और नाच-गाने से तौबा कर ली थी. 38 वर्षीय पूनम पिछले वर्ष बिहार के रोहतास ज़िला परिषद की उपाध्यक्ष चुनी गईं. महज़ प्राथमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद राज-समाज की गहरी परख रखने वाली पूनम कहती हैं, "उपाध्यक्ष की कुर्सी तो मिल गई लेकिन आज भी मुझे गुज़रे दिनों के कड़वे अनुभवों से जोड़कर देखा जाता है, मुझे सम्मान और संवैधानिक अधिकार से वंचित रखा गया है." पूनम कहती हैं, "और तो और एक चपरासी भी मेरी बातें नहीं मानता था और मेरे चैम्बर के बाहर मेरा मखौल उड़ाया जाता था." पूनम बताती हैं कि बुरे बर्ताव और अवैतनिक पद पर होने की वजह से आने वाली आर्थिक दिक्कतों से परेशान होकर उन्होंने दोबारा नाच-गाकर अपने परिवार को पालने का फ़ैसला किया. दूसरी तरफ़ ज़िला परिषद की अध्यक्ष शीला सिंह कहती हैं, "उपाध्यक्ष के नाते पूनम को जितना सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए वह मिला है. पूनम नट जाति से हैं और यह जाति परंपरागत तौर पर नाच-गाने के लिए जानी जाती है लेकिन यह अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज का एक हिस्सा आज भी इसे अच्छा नहीं मानता." पूनम स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहती हैं, "मैंने पैरों में एक बार फिर घुंघरू बांधे हैं कोठे पर वापस नहीं गई हूँ जिसे मैंने दस साल पहले छोड़ दिया था. मेरा यह क़दम उस समाज के मुँह पर तमाचा है जो महफ़िलों में मेरे विरहा की तान सुनकर मुझे सर-आँखों बिठाता है लेकिन मेरे राजनीतिक अधिकार और वर्चस्व को स्वीकार करने से डरता है." पूनम अपने बचपन की कड़वी यादों और बदनाम गलियों में पहुँचने की कहानी को भूली नहीं हैं. वह उसी कड़वाहट के साथ चुनौती देती हैं, "कोई माई का लाल यह साबित कर दे कि मैं कोठे पर लौट आई हूँ तो मैं अपने पद से इस्तीफ़ा दे दूँगी." नामी गायिका पूनम विरहा गायकी के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों का जाना-पहचाना नाम है. टी-सीरीज से इनके अनेक कैसेट आए हैं और एक दौर ऐसा भी था जब उनके नाच-गाने के शौकीन लोग आपस में गोलीबारी पर भी आमादा हो जाते थे. पूनम पूछती हैं कि "जब ऐश्वर्या राय पैरों में घुंधरू बांध कर नाचती हैं तो उन्हें कोई बुरी नज़र से क्यों नहीं देखता? मेरे तीन बच्चे हैं उनकी ज़िम्मेदारी भी मेरी है और फिर हमें कोई वेतन और भत्ता तो मिलता नहीं. नाच-गान से मैं बस इतना कमा लेती हूँ कि अपने बच्चों को एक सम्मानजनक भविष्य सुनिश्चित कर सकूँ." सासाराम के समाजिक कार्यकता परवेज़ आलम पूनम जैसी महिलाओं को जनप्रतिनिधि के रूप में सम्मान नहीं मिलने को एक सामाजिक विकार मानते हैं. परवेज़ आलम कहते हैं, "एक दशक पूर्व पूनम शादी के समारोहों में नाचने- गाने पहुंचती थीं तो शामियानों में गोलियाँ तक चल जाती थीं. लोग पूनम का जलवा देख कर आपस में भिड़ जाते थे पर आज एक जनप्रतिनिधि के रूप में पूनम को वाजिब सम्मान नहीं मिल रहा." करगहर के ज़िला पार्षद वशिष्ठ चौधरी दावा करते हैं कि पूनम देवी को उपाध्यक्ष निर्वाचित करवाने में उनका अहम योगदान है लेकिन वह भी पूनम से एक दूरी बनाए रखना अपनी प्रतिष्ठा के लिए ज़रूरी समझते हैं. वशिष्ठ चौधरी कहते हैं, "पूनम जी एक अच्छी कलाकार हैं और लोग उनके गीतों को पसंद करते हैं लेकिन सार्वजनिक जीवन में होने के नाते उनसे दूरी बनाए रखना मेरे सम्मान के लिए ठीक है." तमाम बाधाओं के बावजूद पूनम अपना संघर्ष जारी रखना चाहती हैं. उनका कहना है कि बदनाम गलियों को छोड़ने से महिलाएँ सिर्फ़ इसीलिए कतराती हैं कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा. पूनम की दलील है कि इन महिलाओं को सम्मान देकर ही उन्हें बदनामी के दलदल से निकाला जा सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें मधुसूदनपुर में वेश्यावृत्ति ज़िंदगी का हिस्सा 30 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस कोलकाता में वेश्याओं का 'अपना बैंक'10 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस हक़ के लिए बार बालाएँ कोलकाता पहुँचीं02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अधिकार चाहती हैं भारतीय यौनकर्मी18 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस यौनकर्मियों ने बदलावों का विरोध किया09 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस लोकप्रिय हो रहा है यौनकर्मियों का बैंक27 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस उन्हें मिले 'मनोरंजनकर्मी' का दर्जा27 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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