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बहुत थोड़े मतों से होगी जीत-हार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पाँचवें दौर के मतदान प्रतिशत ने तो गिरावट के नए कीर्तिमान ही स्थापित कर दिए हैं. इससे साफ़ है कि हार-जीत का अंतर बहुत थोड़ा होगा. राजनीतिक दृष्टि से जागरूक और चाक-चौबंद सत्तापीठ होने के बावजूद राजधानी लखनऊ में तो सिर्फ़ 37 प्रतिशत मतदाता ही मतदान केंद्रों तक आए. लखनऊ (पश्चिम) विधानसभा क्षेत्र में तो हद ही हो गई, जहाँ महज 28 प्रतिशत ही वोट पड़े, जिसकी वजह किसी की समझ में नहीं आती. इस वार वोटर कुछ ज़्यादा ही उदासीन रहा. और इल्ज़ाम फिर आया पहचान पत्र और वोटर लिस्ट के बीच तालमेल नहीं होने पर. फिलवक़्त तो शेष बचे दो दौरों में बची दोषपूर्ण मतदाता सूचियों के मामले में भी आयोग कुछ नहीं कर सकता, लेकिन किसी अगले चुनाव के पहले आयोग को तत्परता से यह मसला प्राथमिकता के आधार पर सुलझाना ही होगा. इस कमतर मतदान के बाद यह भी तय हुआ ही समझा जाना चाहिए कि इस बार मतगणना के दौरान हार-जीत का फैसला मामूली अंतर से ही होगा. मतदान बाद सर्वे माना जाता है कि मतदान कर केंद्रों से बाहर आते मतदाता प्रायः सच ही कहते हैं, लिहाजा मतदान बाद सर्वेक्षणों को ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है. अब तक हुए पाँच दौर के चुनाव में बसपा की दो और सपा की एक दौर में बढ़त बताई गई है और भाजपा को शेष दो दौरों में दूसरों से आगे बताया गया है. काँग्रेस के बारे में सर्वेक्षणकर्ताओं की राय है कि उसने अपनी स्थिति पाँचवें दौर में कुछ और संभाली है. हालाँकि दौड़ में वह अब भी चौथे स्थान पर है.
यह बताई गई बढ़त और हैसियत ऐसी मतगणना में सीमित हद तक ही भरोसेमंद मानी जाती है, जहाँ जय और पराजय के बीच का अंतर हज़ारों का नहीं बल्कि हज़ार का हो और कई मामलों में तो कुछ सौ का ही रह जाए. इसलिए सर्वेक्षणों के इन निष्कर्षों को महज इशारा ही मानकर चला जा सकता है. ज़मीनी सच्चाई इस ज़मीनी वास्तविकता यही है कि उत्तरप्रदेश में किसी एक दल को ‘स्पष्ट बहुमत’ मिलने के आसार चुनाव के हर दौर के बाद कम ही होते जा रहे हैं. इस सच्चाई के बावजूद कि अगर प्रदेश में स्थाई सरकार चाहिए तो किन्हीं दो बड़े दलों को मिलकर ही सत्ता की साझेदारी के लिए ख़ुद को तैयार करना चाहिए, अभी तक बड़े नेताओं ने पलक नहीं झपकाई है. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह लखनऊ में कह गए, "हम अपने दम पर सरकार बनाएँगे, किसी और के साथ सत्ता की साझेदारी अब नहीं होगी" तो अमर सिंह ने नटवर सिंह के भाजपा के साथ चुनाव बात तालमेल की संभावना को उनके निजी विचार बता दिया. इन दिनों सपा के चुनाव प्रचार में शिरकत कर रहे नटवर सिंह ने कहा बताते हैं कि राजनीति में कोई ‘अछूत’ नहीं होता और भाजपा के साथ भी सरकार बनाने के लिए चुनावोत्तर तालमेल हो सकता है. अमर सिंह ने कहा, "भाजपा के साथ सपा का कोई चुनावोत्तर तालमेल हो, इसके हम सख़्त ख़िलाफ़ हैं."
कल्याण सिंह तो ‘न सपा, न बसपा’ वाली बात को किसी चुनावी मंत्र की तरह दोहराते रहते हैं. इस वक़्त तो उनका मनोबल इतना बढ़ा हुआ है कि वे भाजपा के विजयी और अपने मुख्यमंत्री पद पर सत्तारुढ़ होने को सिर्फ़ संभावना नहीं बल्कि एक निश्चितता मानने लगे हैं. माया की माया मायावती तो सुना गया है आजकल अपने उन सहयोगियों की प्रारंभिक सूची बनाने के काम में लगी हुई हैं जो उनके मुख्यमंत्री पद के साथ मंत्रिपद की शपथ लेंगें. इनमें कुछ ऐसे नामों की भी चर्चा है जो विधानसभा का चुनाव लड़ ही नहीं रहे बल्कि सांसद हैं या अब तक जनप्रतिनिधि नहीं बने हैं. वे चुनाव परिणामों में अपने ठोस और स्पष्ट बहुमत के लिए परम आश्वस्त हैं. छठे और सातवें दौर में क्रमशः 52 और 59 यानी कुल 111 सीटों पर मतदान शेष है. खागा में मतदान पाँचवें दौर में ही होना था, लेकिन वहाँ काँग्रेस प्रत्याशी की मृत्यु के कारण अब 28 मई को चुनाव तिथि निर्धारित की गई है. इस तरह कुल 112 सीटों पर मतदान के बाद चुनाव 2007 के इस महाकुंभ का समापन हो जाएगा. दावे भाजपा मानती है कि इन अंतिम दो दौरों में जहाँ अधिकांश सीटें पूर्वांचल की हैं, वह अपनी स्थिति मजबूत कर लेगी. जबकि बसपा का मानना है कि शेष दो दौर उसकी विजय-यात्रा के अहम मील स्तंभ होंगे.
सपा और कांग्रेस कोई बढ़ चढ़कर दावा नहीं कर रहे हैं मगर साथ ही यह भी जोड़ना नहीं भूलते कि उनके संयम को उनकी कमजोरी मानने की भूल न की जाए. सपा का तो मानना है कि चूँकि इन दो दौरों में अनेकानेक मुस्लिम और यादव बहुल इलाके आते हैं जहाँ उन्हें कुछ और कहने-करने की ज़रूरत नहीं. जो कुछ कहना और करना था नेताजी (मुलायम सिंह) कर चुके हैं. चुनावी पंडित और सर्वेक्षणकर्ता और कोई बात पुख्ता तौर पर भले ही कहने की स्थिति में स्वयं को नहीं पा रहे हों पर इस एक बात के बारे में उनमें सर्वानुमति है कि किसी एक दल को स्थाई सरकार बनाने लायक बहुमत मिलना अब तब तक के पाँच दौरों की समीक्षा और अगले दो दौरों के अनुमान को ध्यान में रखते हुए लगभग असंभव है. वे यह भी मानते हैं कि मतदान के अप्रत्याशित रूप से कम होने की वजह से विजयी और पराजित उम्मीदवारों के बीच का फासला अधिकतर क्षेत्रों में बहुत मामूली रहेगा. यह एक ऐसा कारक है जिसकी वजह से व्यापक चुनाव-परिणाम अनुमानों से छूटकर अलग भी जा सकते हैं. (लेखक ‘दिनमान’ और ‘स्वतंत्र भारत’ के पूर्व संपादक हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें उत्तर प्रदेश में पाँचवें चरण का प्रचार थमा26 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस यूपी में चौथे चरण का प्रचार समाप्त21 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस दूसरे चरण में 45 फ़ीसदी मतदान13 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस यूपी में मतदान हुआ संपन्न07 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस राहुल पर टिकी कांग्रेसियों की उम्मीदें01 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस यूपी चुनावों में प्रचार के नए तरीके31 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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