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उत्तर प्रदेश: विकास और बदलाव की चाह

महिलाएं
उत्तर प्रदेश में लोग विकास और रोजग़ार चाहते हैं
साढ़े सत्रह करोड़ की जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश यदि एक स्वतंत्र देश होता तो आबादी के लिहाज़ से दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश होता.

शनिवार को पहले चरण का मतदान शुरू होने के साथ ही राज्य अपनी नए विधानसभा को चुनने की दहलीज़ पर खड़ा है.

विधानसभा की 403 सीटों पर कब्ज़ा जमाने और सत्ता में हिस्सेदारी की हसरत लिए हज़ारों उम्मीदवार मैदान में हैं.

चुनाव सात चरणों में होने हैं, जो क़रीब एक महीने तक चलेंगे. चार करोड़ 90 लाख से भी अधिक मतदाता हजारों पुलिसकर्मी और अर्द्धसैनिक बलों की निगरानी में क़रीब पचास हज़ार मतदान केंद्रों पर अपना वोट डालेंगे.

माना जाता रहा है कि अपनी विशाल आबादी और आकार के चलते उत्तर प्रदेश केंद्र सरकार की नीतियों पर हमेशा से प्रभाव डालता रहा है.

लेकिन आज भारत के कई लोग इस प्रदेश को एक बोझ मानने लगे हैं और एक ऐसा रोड़ा भी, जो शेष भारत को आगे बढ़ने में बाधक है.

निराशा

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र आदित्य चिलवार कहते हैं, "यहाँ बहुत ज़्यादा भ्रष्टाचार है कुछ भी ठीक-ठाक नहीं चल रहा."

कानपुर के रहने वाले चिलवार कहते हैं, "एक समय था जब कपड़ा उद्योग में सबसे आगे होने के चलते कानपुर को पूरब का मैनचेस्टर कहा जाता था, पर आज न बिजली है न रोज़गार. प्रदूषण भी बहुत ज़्यादा है.''

छात्र
प्रदेश के छात्रों का मानना है कि दूसरे राज्य में रोज़गार के बेहतर विकल्प हैं

वे कहते हैं, ''प्रदेश में एक स्थान जहाँ शायद आपको नौकरी मिल सकती है वह है नोएडा. लेकिन वह यूपी का एक हिस्सा होने के बजाए दिल्ली का उपनगर ज़्यादा है."

उनकी मानें तो उत्तर प्रदेश की स्थिति आज एक अभिशप्त राज्य जैसी हो गई है.

चहल-पहल से भरे विश्वविद्यालय पिरसर में मेरी मुलाक़ात चाय पीतीं लड़कियों से हुई जो पढ़-लिख कर बैंकर बनना चाहती हैं.

इनमें से एक - अंकिता कहती हैं, ''उत्तर प्रदेश की छवि अच्छी नहीं है. भारत के दूसरे हिस्से के मुक़ाबले यहाँ रोज़गार के अवसर भी ज़्यादा नहीं है. इतनी ही पढ़ाई और कोशिश यदि दूसरे जगहों पर की जाए तो इसका ज़्यादा फ़ायदा मिलेगा.''

अनीशा इसी को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, ''यदि मुझे बंगलोर में काम करने का मौक़ा मिले तो मैं ज़रूर वहाँ काम करूँगी क्योंकि वह पहले से ही विकसित है.''

सुर्ख़ियों में प्रदेश

वैसे इन लोगों की यह निराशा बेवजह नहीं है. राज्य कमोबेश हमेशा ही चर्चा में होता है लेकिन नकारात्मक कारणों से.

पिछले कुछ महीनों में नोएडा में दर्ज़नों बच्चों के बलात्कार और हत्या के बारे में हज़ारों पन्ने लिखे जा चुके हैं.

अपराध के बढ़ते ग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश के लोगों की नींद उड़ा दी है और क़ानून व्यवस्था की स्थिति भी सोचने योग्य है.

पिछले साल पुलिस में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले कई लोगों ने ग़ाज़ियाबाद में भारी दंगा मचाया क्योंकि उनका मानना था कि प्रश्न पत्र बहुत कठिन था.

स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी राज्य की स्थिति अत्यंत दयनीय है. दुनिया भर से पोलियो को ख़त्म करने के अभियान में विफलता का कारण उत्तर प्रदेश को माना जा सकता है.

हर साल यहाँ सैकड़ों बच्चे इंसेफ़ेलाइटिस से मर जाते हैं. बच्चों को जन्म देते समय हर एक लाख में से 700 महिलाएँ मर जाती हैं. जबकि पूरे देश में यह अनुपात 407 प्रति लाख है.

भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक शिशु कुपोषण की दर भी इस प्रदेश में उतनी ही भयावह है.

मोनिंदर और सुरेंद कोली
उत्तर प्रदेश पिछले दिनों में नकारात्मक कारणों से सुर्ख़ियों में रहा है, निठारी कांड उनमें से एक था

मच्छरों के आतंक और आपराधिक दहशत से त्रस्त प्रदेश के पूर्वी ज़िलों गोरखपुर, देवरिया, मऊ, ग़ाज़ीपुर और वाराणसी का दौरा करते हुए आपको रास्ते में जहाँ चहल-पहल से भरे कस्बाई बाज़ार मिलते हैं, वहीं बच्चों की बाट जोहते खाली सरकारी प्राथमिक विद्यालय भी.

देवरिया में कुछ हज़ार श्रोताओं के सामने अपनी उपलब्धियाँ गिनाते मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की चुनावी रैली में हम शामिल हुए.

नेता हुए धनवान

पहलवान से राजनेता बने मुलायम की पार्टी का नाम तो समाजवादी पार्टी है लेकिन जैसा कि उनके आलोचक कहते हैं कि उनकी जीवन शैली में कुछ भी समाजवाद जैसा नहीं है.

ख़ुद चुनाव आयोग के समक्ष दिए गए ब्योरे के मुताबिक़ एक किसान के बेटे मुलायम आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं. पिछले ही महीने सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी संपत्ति की जाँच के आदेश भी दिए हैं.

उनकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मायावती यूँ तो एक ग़रीब और दलित परिवार से आती हैं लेकिन आज उनके नाम भी करोड़ों की संपत्ति है.

राज्य में टक्कर इन्हीं दो पार्टियों के बीच मानी जा रही है क्योंकि दोनों राष्ट्रीय पार्टियाँ कांग्रेस और भाजपा पिछले वर्षों में इस प्रदेश में पतन की ओर ही अग्रसर रही हैं.

और यदि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर विश्वास किया जाए तो पिछले कुछ चुनावों की तरह ही इस बार भी राज्य का जनादेश बँटा हुआ ही आने की संभावना है.

पिछड़ेपन की वजह

गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर रह चुके रामकृष्ण मणि त्रिपाठी कहते हैं, "राज्य के पिछड़ेपन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गठबंधन की राजनीति ही रहा है."

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रताप भानु मेहता राज्य की बेहतरी के लिए इसे तीन भागों में बाँट देने का सुझाव देते हैं.

वह कहते हैं, ''इस राज्य को एक रखने का न तो कोई प्रशासनिक तर्क है, न ही कोई आर्थिक औचित्य. ऐसा कोई राजनीतिक कारण और यहाँ तक कि कोई सांस्कृतिक या भाषाई वजह भी नहीं दिखती.''

 राज्य को एक रखने का न तो कोई प्रशासनिक तर्क है, न ही कोई आर्थिक औचित्य. ऐसा कोई राजनीतिक कारण और यहाँ तक कि कोई सांस्कृतिक या भाषाई वजह भी नहीं दिखती.
भानु प्रताप मेहता

अपने सुझाव के समर्थन में मेहता हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे छोटे राज्यों का उदाहरण गिनाते हैं जिन्होंने छोटा होने के चलते काफ़ी विकास किया है.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर चंद्रकला पांडिया कहती हैं,"वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई देती."

बदलाव की बयार

लेकिन राज्य के कुछ लोगों का धैर्य अब जवाब दे चुका है और वे ख़ुद आगे आकर इसे बदल डालना चाहते हैं.

पिछले दिनों विभिन्न क्षेत्रों में सफल कुछ युवाओं ने मिलकर अपनी एक राजनीतिक पार्टी बनाई और 'भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के चंगुल से प्रदेश को मुक्त कराने' के लिए चुनाव लड़ने की योजना भी बना रहे हैं.

उनके इस प्रयास को एक बड़े बदलाव के रूप में नहीं तो विरोध के एक संकेत के रूप में तो देखा ही जा सकता है.

बैंकिंग की पढ़ाई कर रही शीतल जैसे कुछ लोगों के लिए यह आशावाद का एक कारण भी है.

वे कहती हैं, ''यदि मौक़ा मिले तो यह राज्य फिर से अपने गौरवशाली दिनों में वापस लौट सकता है. इसमें भारत के सबसे अच्छे राज्य बनने की संभावनाएं मौजूद हैं. लेकिन यह हमें ही करना होगा. हम बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन हम अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते हैं.''

इससे सभी सहमत हैं कि सर्वश्रेष्ठ राज्य बनने की यह यात्रा बहुत दुष्कर होगी. नीचे उतरना बहुत आसान और बहुत तेज़ी से होता है लेकिन ऊपर चढना बहुत कठिन होता है.

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