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इस बार भी नज़रें मुसलमानों पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में स्थानीय विकास और क़ानून व्यवस्था के मुद्दों के अलावा इस बात पर नज़र होगी कि जातीय समीकरण क्या नतीजे सामने लाते हैं. ऐसे में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए ‘माई’ या मुस्लिम-यादव गठजोड़ अहम है. वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी कहते हैं, “अगर प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 16 प्रतिशत से ज़्यादा है, 124 चुनाव क्षेत्रों में उनकी संख्या 15 प्रतिशत तक है जो काफ़ी अहम है.” लेकिन मुलायम सिंह यादव के चुनावी भाषणों में मुसलमानों का समर्थन अपनी जेब में रखने के लिए जिन मुद्दों का इस्तेमाल हो रहा है वो पाँच साल पुराने हैं, जैसे गुजरात के दंगे. मगर समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता शाहिद सिद्दीकी सोचते हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश का मतदाता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को दूर रखने के लिए नहीं बल्कि मुसलमानों के हित में उठाए गए समाजवादी पार्टी के क़दमों की वजह से उसे वोट देगा. वे मुसलमानों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए क़दमों की बात करते हैं. बदलेंगे समीकरण? शाहिद सिद्दीकी मुलायम सरकार की उपलब्धियाँ गिनाते नहीं थकते लेकिन दिलीप अवस्थी जैसे विश्लेषकों का मानना है कि ज़मीनी सच्चाई कुछ और है. वो कहते हैं, “ज़्यादातर वादे ज़मीनी सच्चाई में तब्दील नहीं हुए. दूसरी बात यह कि बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसे मुद्दे जिसकी वजह से मुसलमान मुलायम सिंह की ओर देख कर कहते थे कि उन्होंने इसे अपने कार्यकाल में बचाए रखा, अब प्रासंगिक नहीं रहे.” मगर शाहिद सिद्दीकी मानते हैं कि समाजवादी पार्टी को ख़तरा भाजपा से ज़्यादा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से है क्योंकि मुस्लिम वोट सपा-बसपा के बीच बँटते रहे हैं. मगर शाहिद सिद्दीकी कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. राहुल गांधी की कप्तानी में उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ों को फिर से मज़बूत करने में लगी कांग्रेस पार्टी के एक नेता राशिद अलवी मानते हैं कि मुस्लिम मतदाता सपा और बसपा दोनों की असलियत देख चुका है. वो कहते हैं, “मुस्लिम मतदाता देख चुका है कि सपा से उसे कुछ नहीं मिला और बसपा के बारे में वो जानता है कि वो भाजपा जैसी पार्टियों के साथ भी हाथ मिला सकती हैं.” दिलीप अवस्थी बताते हैं कि ‘माय’ फ़ैक्टर इस बार मुलायम के हाथ से क्यों निकल सकता है, “माय फ़ैक्टर हमेशा से रहा है लेकिन पहले हुए चुनावों में कोई ना कोई सांप्रदायिक मुद्दा हमेशा रहा है जो इस बार मौजूद नहीं है. दूसरी बात भाजपा सपा के लिए इतनी ख़तरनाक नहीं दिख रही है. नतीज़तन मुस्लिम मतदाताओं को सपा के पक्ष में इकट्ठा रखने लायक बातें मौजूद नहीं है जिससे मुलायम सिंह को नुकसान हो सकता है. मगर वो भी अभी यादवों के निर्विवाद नेता हैं.” कोशिश दिलीप अवस्थी का कहना है कि मुस्लिम मतदाताओं का बसपा की ओर जहाँ झुकाव है उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि पिछले चुनावों में भी बसपा को मिले कुल वोटों में मुस्लिम वोट दस प्रतिशत से ज्यादा थे. मगर मुस्लिम वोट को खींचने की उतनी ही कोशिश राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) भी कर रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव रखने वाले उसके एक नेता महमूद मदनी मानते हैं कि मुस्लिम वोट हमेशा बँटता है और इस बार उन्हें इसका लाभ पहुँच सकता है. अवस्थी मानते हैं कि ऐसी छोटी पार्टियाँ मुलायम सिंह के ‘माई’ फ़ैक्टर में कोई ख़ास सेंध नही लगा सकतीं. जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं एक बात साफ़ होती जा रही है कि मुलायम सिंह यह मान कर नहीं चल सकते कि मुस्लिम मतदाता निश्चित ही उनके साथ रहेगा. वो देख रहा है कि इस बार बिसात पर क्या है और उसी हिसाब से अपनी चाल भी चलेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें 'वंदे मातरम' को अनिवार्य करेगी भाजपा02 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस राहुल पर टिकी कांग्रेसियों की उम्मीदें01 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले का आदेश14 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तरप्रदेश में दूसरे चरण का नामांकन शुरु18 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश31 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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