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सोमवार, 19 मार्च, 2007 को 03:19 GMT तक के समाचार
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मुख़्तार माई को मानवाधिकार पुरस्कार
मुख़्तार माई
मुख़्तार माई मानती हैं कि क़ानूनों को अमल में लाना अभी भी कठिन काम है
पाकिस्तान में महिलाओं के लिए लड़ाई की प्रतीक बन चुकी मुख़्तार माई को यूरोपीय परिषद के मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है.

मुख़्तार माई ने उन लोगों को सज़ा दिलाने के लिए आंदोलन छेड़ दिया था जिन्होने उनके साथ बलात्कार किया था.

उन्हें आख़िरकार बलात्कारियों को सज़ा दिलवाने में सफलता मिली थी.

उन्हें फ़ेयर ट्रेड मूवमेंट के फ़्रांसिस्को वैन डेर हॉफ़ के साथ साझा रुप से इस पुरस्कार के लिए चुना गया है.

मुख़्तार माई ने पाकिस्तान में बलात्कारियों को सज़ा दिलाने वाले क़ानून में किए गए परिवर्तनों का स्वागत किया है.

इस क़ानून में पहले प्रावधान था कि किसी को भी सज़ा दिलवाने के लिए चार गवाह लाना ज़रुरी था.

लेकिन उनका कहना था कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए ज़रुरी है कि उन्हें शिक्षा दी जाए.

आंदोलन

पिछले दो सालों में मुख़्तार माई ने दुनिया भर की यात्रा की है और लोगों को न्याय के लिए अपने संघर्ष के बारे में बताया है.

 अभी तो इस क़ानून को अमल में लाया जाना बचा है. शरिया क़ानूनों को और क़बायली क़ानूनों को बदलना बेहद कठिन है. बलात्कार के ख़िलाफ़ बने नए क़ानून को लागू करना कठिन काम है
मुख़्तार माई

इससे उनके आंदोलन का व्यापक विस्तार हो गया है.

मुख़्तार माई के साथ वर्ष 2002 में एक स्थानीय ग्रामसभा के आदेश पर सामूहिक बलात्कार किया गया था.

यह सज़ा एक ऐसे अपराध के लिए सुनाई गई थी जो वास्तव में उसके भाई ने किया था.

आमतौर पर इस तरह की सज़ा के बाद पाकिस्तान में महिलाएँ आत्महत्या कर लेती हैं लेकिन मुख़्तार माई इस मामले को लेकर अदालत गईं और उन्हें मुआवज़ा भी दिया गया.

इसके बाद मुख़्तार माई ने अपने गाँव में लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला.

इसके बाद ऐसे ही दो और स्कूल खोले जा चुके हैं.

मुख़्तार माई एक प्रदर्शन के दौरान
मुख़्तार माई की लड़ाई बाद में महिला संगठनों की भी लड़ाई बन गई थी

पहले तो पाकिस्तान सरकार का रवैया मुख़्तार माई को लेकर अच्छा नहीं था. उन्हें देश से बाहर जाने से भी इसलिए रोक दिया गया कि कहीं वह देश के छवि ख़राब न कर दें.

लेकिन लंबे आंदोलन के बाद आख़िर उन्हें जाने दिया गया और बलात्कारियों को सज़ा दिलाने वाले क़ानून को संसद ने मंज़ूरी दे दी.

हालांकि मुख़्तार माई इससे संतुष्ट नहीं हैं और मानती हैं, "अभी तो इस क़ानून को अमल में लाया जाना बचा है. शरिया क़ानूनों को और क़बायली क़ानूनों को बदलना बेहद कठिन है. बलात्कार के ख़िलाफ़ बने नए क़ानून को लागू करना कठिन काम है."

मुख़्तार माई और फ़्रांसिस्को वेन डेर हॉफ़ को लिस्बन में सोमवार को पुरस्कृत किया जा रहा है.

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