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'शोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी'
मुख़्तार माई
मुख़्तार माई ने अमरीका में अपने अनुभव बांटे
पाकिस्तान में सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई मुख़्तार माई ऐमनेस्टी इंटरनेशनल के बुलावे पर अमरीका गई हुई हैं.

ऐमनेस्टी ने महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने और महिलाओं के अधिकारों की पैरवी में उनकी भूमिका की सराहना की है.

मुख़्तार माई उस समय चर्चा में आई थीं जब अबसे तीन साल पहले पाकिस्तान में एक पंचायत के आदेश पर उन्हें बलात्कार का निशाना बनाया गया और फिर मानवाधिकार संगठनों ने यह मामला उठाया.

उनके अमरीका प्रवास के दौरान पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन उन्हें एक पत्रिका की ओर से वर्ष की महिला का पुरस्कार देंगे.

 मैं शोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रही हूँ. उस शोषण का जिसका शिकार महिलाओं और ग़रीबों को सामंतवादियों के हाथों बनाया जाता है.
मुख़्तार माई

ऐमनेस्टी के वॉशिंगटन स्थित मुख्यालय में मौजूद लोगों से एक दुभाषिए की मदद से बातचीत करते हुए मुख़्तार माई ने कहा, "मैं शोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रही हूँ. उस शोषण का जिसका शिकार महिलाओं और ग़रीबों को सामंतवादियों के हाथों बनाया जाता है".

"उनके पास ताक़त और पैसा होता है और मेरे साथ आप हैं और आप का समर्थन है. ख़ुदा ने चाहा तो जीत सच्चाई की ही होगी".

मुख़्तार माई ने कहा कि बलात्कार और बाद में लंबी अदालती कार्रवाई भी उन्हें देश छोड़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकती.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यह लड़ाई पाकिस्तान में रह कर ही लड़ी जा सकती है. वहाँ से निकल कर नहीं".

इस प्रवास के दौरान वह संसद में मानवाधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई में एक प्रमुख गवाह की हैसियत से हिस्सा लेंगी.

 उनके पास ताक़त और पैसा होता है और मेरे साथ आप हैं और आप का समर्थन है. ख़ुदा ने चाहा तो जीत सच्चाई की ही होगी.
मुख़्तार माई

बुधवार को उन्हें ग्लैमर पत्रिका की ओर से वर्ष की महिला का सम्मान और बीस हज़ार डॉलर नक़द का पुरस्कार मिलेगा.

मुख़्तार माई का कहना है कि इस राशि में से पाँच हज़ार डॉलर वह आठ अक्तूबर के भूकंप से प्रभावित परिवारों को देंगी और शेष स्कूलों और महिलाओं के कल्याण कार्यों में.

उनकी अमरीका यात्रा विवादों से घिरी रही है.

इस साल के शुरू में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने उनकी विदेश यात्रा पर इस भय से पाबंदी लगा दी थी कि इससे कहीं पाकिस्तान की छवि धूमिल न हो.

हालाँकि बाद में अमरीकी अधिकारियों और मानवाधिकारी कार्यकर्ताओं की आलोचना के बाद उन्होंने यह पाबंदी हटा दी थी.

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