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शनिवार, 17 मार्च, 2007 को 10:26 GMT तक के समाचार
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बिन पैसा किस काम की एटीएम

बंद पड़ी बॉयोमेट्रिक एटीएम
ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद ने 12 मार्च को एटीएम का उद्धाटन किया था
बुद्धकालीन इतिहास की साक्षी रही वैशाली नगरी के ग्रामीण अंचल में देसी लोगों के लिए हाल ही में अवतरित हुई एक 'विदेशी वधू'.

नाम है इसका बायोमेट्रिक एटीएम और काम है अंगूठे छाप श्रमिकों को उनके बैंक खाते से रुपए देना.

वैशाली की नगर वधू जैसी ही सुंदर दिखने वाली इस ऑटोमैटिक टेलर मशीन यानी एटीएम रूपी देवी को सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया की वैशाली गढ़ शाखा में गत 12 मार्च को स्थापित किया गया.

उद्घाटनकर्ता थे वैशाली के सांसद और देश के ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह.

लेकिन ये क्या! रुपए बाँटने वाली इस रूपवती के चेहरे से जो घूँघट रघुवंश बाबू ने उठाया था, उसे अगले ही दिन एटीएम के चेहरे पर डाल दिया गया.

इस संबंध में पूछे जाने पर बैंक के मैनेजर प्रणय कुमार ने मायूस होकर बताया, '' ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम करने वाले जिन श्रमिकों की सुविधा के लिए यह मशीन लगाई गई है, उनके खाते में एक भी पैसा नहीं है. इसलिए मशीन को उद्घाटन के बाद ही बंद कर देना पड़ा.''

अब बिहार में इस तरह की पहली और अकेली बायोमेट्रिक एटीएम सजे-सँवरे कमरे के ताला बंद दरवाजे के पीछे है और उद्घाटनकर्ता केंद्रीय मंत्री के आगमन की निशानी शिलापट्ट वहाँ चमक रहा है.

बॉयोमेट्रिक एटीएम की ख़ूबी

इस बायोमेट्रिक एटीएम को 'एजीएस इन्फोटेक विंकर निक्सडोर्फ' नामक कंपनी ने बनाई है और इसमें अंगूठे का निशान पहचानने, बोलने और रुपए के चित्र दिखाने की व्यवस्था है.

मशीन की एक ख़ास जगह को अंगूठा से दबाने पर उस अंगूठे वाले व्यक्ति की पहचान संबंधी तस्वीर पर्दे पर उभर आती है.

यदि किसी एटीएम कार्ड नंबर से अलग कोई व्यक्ति अपना अंगूठा वहाँ सटाएगा तो मशीन उसे नकार देगी.

सही व्यक्ति का अंगूठा निशान पहचान लेने के बाद मशीन बोलती है कि आपको स्क्रीन पर दिखाए जा रहा रुपए के चित्रों में से कौन-कौन और कितने रुपए की दरकार है.

बॉयोमेट्रिक एटीएम
इस एटीएम को ख़ासतौर पर अनपढ़ों के लिए बनाया गया है

इसके बाद जिस-जिस रुपए पर उंगली रखी जाएगी वह मशीन से बाहर निकल आएगा. एक बार में कोई खाताधारक एक हज़ार रुपए से ज्यादा नहीं निकाल सकता.

इस तरह न तो पिन याद रखने और न ही निर्देश पढ़कर उसके अनुसार संचालन करने की बाध्यता रहती है.

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के साथ इस एटीएम को जोड़ने का उद्देश्य है अनपढ़ मज़दूरों की सहूलियत और उन्हें बिचौलियों के चंगुल में फँसने से बचाना.

क्यों नहीं है काम?

एटीएम की ख़ूबियाँ अपनी जगह हैं लेकिन अगर किसी इलाक़े में रोज़गार गारंटी योजना के तहत कोई काम नहीं होगा तो इसमें पैसा कहाँ से आएगा.

ऐसा ही कुछ वैशाली के 250 अनपढ़ मज़दूरों के साथ भी हुआ है, जिनका खाता तो खुल गया है लेकिन कमाई न होने से बैंक बैलेंस कुछ भी नहीं है.

अब सवाल उठता है कि इस इलाक़े में रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम क्यों नहीं है.

इस संबंध में पूछताछ करने पर पता चला कि 'चालीस और साठ' का अनुपात इसमें एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा है.

वैशाली के मुखिया से लेकर ग्रामीण मज़दूर तक सबने यही कहा कि रोज़गार गारंटी योजना के सौ रुपए में से 60 रुपए मज़दूरी पर और बाक़ी 40 रुपए सामग्रियों पर ख़र्च करने का नियम बना दिया गया है.

इस दायरे में सिर्फ़ मिट्टी का काम, पानी, सड़क, तालाब वगैरह बनवाना ही संभव हो सकता है. दिक्क़त ये है कि वैशाली में मिट्टी का काम नहीं के बराबर है.

यानी कुल मिलाकर ' न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी' जैसी स्थिति है. यानी श्रमिकों के लिए जब काम ही नहीं है तो बैंक खातों में पैसा जमा कैसे होगा.

जाहिर है एटीएम रूपी वधू लाज के मारे घूँघट में अपना चेहरा छिपाए बैठी है.

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