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काज़ीरंगा में गैंडे बढ़ने से वन्य जीव प्रेमी ख़ुश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम के काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में दुर्लभ और विलुप्तप्राय घोषित एक सींग वाले गैंडों की संख्या बढ़ने से वन विभाग और वन्य जीव संरक्षण से जुड़ी स्वयंसेवी संस्थाएं काफ़ी खुश हैं. इसकी बड़ी वजह असम में वन्य जीवों के अवैध शिकार की घटनाओं में आई कमी है. हालांकि नेपाल में धड़ल्ले से जारी अवैध शिकार को लेकर अभी चिंता बरकरार है. एक सींग वाले गैंडे को बचाने की रणनिति पर विचार करने के लिए गुरुवार को काज़ीरंगा में वन्य प्राणी संरक्षकों की बैठक हुई. 'इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर द कन्जर्वेशन ऑफ़ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज' यानी आईयूसीएन की अगुआई में तीन दिनों तक चली बैठक में काज़ीरंगा में गैंडे की बढ़ती आबादी पर संतोष जताया गया. बैठक में भारत और नेपाल के वन्य संरक्षकों ने इस बात पर चर्चा की कि एशियाई गैंडों को शिकारयों से बचाने के लिए दोनों देशों में किस तरह का सहयोग किया जा सकता है. काजीरंगा में गैंडों के संरक्षण से संबंधित कार्यक्रम को शुरू हुए 101 वर्ष हो चुके हैं और पिछले वर्ष वन विभाग की ओर से करवाई गई गिनती के नतीज़े उत्साहजनक हैं. पिछले साल कराई गई गिनती के मुताबिक काज़ीरंगा में गैंडों की संख्या 1855 हो चुकी है, जो अब तक की सबसे ज़्यादा है. जबकि 1980 में उद्यान में सिर्फ़ 939 गैंडे ही बचे थे. भारतीय गैंडे या राइनोसेरस यूनिकोर्निस की कुल आबादी का सत्तर फीसदी हिस्सा असम के विभिन्न संरक्षित वनों में रहता है, जिनमें काज़ीरंगा प्रमुख है. ग्रामीणों की मदद गैंडों के लिए सबसे बड़े ख़तरे अवैध शिकार की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन अभी भी यह पूरी तरह बंद नहीं हुआ है. अभी भी हर साल लगभग दस गैंडे शिकारियों के हाथों मारे जाते हैं.
विशेषज्ञों की राय थी कि एक सींग वाले गैंडे के संरक्षण से संबंधित मसलों पर क्षेत्रीय ज़रूरतों के अनुसार रणनीति तैयार की जानी चाहिए और पुरानी रणनीति की समीक्षा होती रहनी चाहिए. इस संदर्भ में गैर-सरकारी संगठन नेचर्स बेकन के निदेशक सौम्यदीप दत्त का कहना है, "काज़ीरंगा के पास रहने वाले गाँव वालों की मदद के बिना किसी भी रणनीति का सफल क्रियान्वयन संभव नहीं है.'' दरअसल काजीरंगा के जंगल से निकलकर गैंडे कई बार पास के गाँवों के खेतों में चले आते हैं. खेतों में निकल आए गैंडों पर अवैध शिकारियों का ख़तरा सबसे ज़्यादा रहता है. काज़ीरंगा के पास के गाँव बांदरडूबी के किसान हसन अली का कहना है कि गाँव वाले अवैध शिकारियों की मौजूदगी की ख़बर वन अधिकारियों को देते रहते हैं. अधिकारी भी ग्रामीणों की मदद ले रहे हैं. वन अधिकारी हेमंत भुईयां का कहना है कि ग्रामीणों को रात में पहरा देने और जानवरों को भगाने के लिए विभाग की ओर से केरोसिन, पटाखे आदि दिए जाते हैं. साथ में विभाग के राइफलधारी सुरक्षाकर्मी भी उनकी मदद के लिए तैयार रहते हैं. लेकिन हसन अली का कहना है कि ग्रामीण युवकों को ही सुरक्षा गार्ड की नौकरी पर लगाया जाए तो राष्ट्रीय उद्यान की बेहतर सुरक्षा हो सकती है. गैंडों के अलावा काजीरंगा एशियाई हाथी, जंगली भैंसे, वनैला सूअर, बारहसिंहा जैसे दुर्लभ और संकटग्रस्त वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास स्थल भी है. साथ ही काजीरंगा की दलदली भूमि जंगली हंस, दलदली बटेर, सारस और बगुलों की विभिन्न प्रजातियों के लिए आदर्श प्रजनन स्थल है. सर्दियों में यहाँ साइबेरिया से कई मेहमान पक्षी भी आते हैं. हालांकि इस दलदली भूमि का धीरे-धीरे ख़त्म होते जाना भी एक गंभीर समस्या है. काज़ीरंगा में विभिन्न प्रजातियों के बाज, विभिन्न प्रजातियों की चीलें, विभिन्न तोते भी हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें नेपाल में लुप्त हो रहे हैं एकसींग वाले गैंडे03 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस महावत को मिला हाथी की मौत का मुआवजा21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस असम में मारा गया 'लादेन'15 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस हाथी पोलो को हरी झंडी मिली16 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस हाथियों से परेशान है छत्तीसगढ़20 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जंगली हाथियों पर नियंत्रण की कोशिश02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस नेपाल में गैंडों की संख्या में कमी20 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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