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सोमवार, 26 फ़रवरी, 2007 को 14:04 GMT तक के समाचार
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विकलांगों को मिला सेना का सहारा

शिविर में 350 लोगों को नक़ली टाँगे लगाई गईं
जम्मू के पहाड़ी ज़िले पुँछ में हमीरपुर स्थित सेना की एक छावनी में बैठी दो बहनें 20 वर्षीया गुलाब जान और 30 वर्षीया फ़ातिमा जान कड़ाके की ठंड में चेहरे पर उम्मीद भरा उत्साह लिए बैठी हैं.

कारण यह है कि यहाँ सेना ने एक शिविर का आयोजन किया है जहाँ लोगों को मुफ़्त में नक़ली टाँगे दी जा रही हैं.

छोटी बहन की दाईं और बड़ी बहन की बाईं टाँग कट चुकी है. मैंने गुलाब जान के पास जाकर पूछा कि यह कैसे हुआ तो वो एकदम से रोने लगी और उसे चुप कराते हुए उसकी बड़ी बहन भी रो पड़ी.

अपने आँसू पूछते हुए गुलाब जान बोली, "ये 2000 की बात है. नियंत्रण-रेखा के पास शाहपुर गाँव में हमारे घर के पास गोबर के ढेर में पाकिस्तान से आए चरमपंथियों ने बम (बारूदी सुरंग) रखा था. सुबह जब हम बाहर थे तो वो फट गया और चारों ओर अँधेरा छा गया."

इसके बाद जब आँख खुली तो गुलाब जान, फ़ातिमा जान और उनकी माँ मारिया बी अस्पताल में थे और तीनों की एक-एक टाँग इस विस्फोट की वजह से बेकार हो चुकी थी.

 इतने लोगों को टाँगें दे कर हमारी फ़ौज ने बता दिया कि वो न सिर्फ़ हमारी रक्षा करती है बल्कि हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर सहारा भी देती है
इक़बाल

"हमारे लिए तो ये सबसे बड़ा कहर था." गुलाब जान फिर रोते हुए कह रही थी. उसके पिता, अहमद दीन अपने गाँव के सरपंच थे. दोनों बहनें और माँ तीन महीने तक अस्पताल में रहीं और फिर उन्हें घर लाया गया.

उस समय गुलाब जान 13 साल की थी और छठी कक्षा में थी जबकि उसकी बड़ी बहन फ़ातिमा की सगाई हो चुकी थी और तीन महीने बाद उसकी शादी थी. लेकिन एक पल में इस धमाके ने इन तीनों को बैसाखियों पर चलने पर मज़बूर कर दिया.

फ़ातिमा जान उस पल को याद करते हुए बोली,"हमारे वालिद(पिता) इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और चल बसे. अब मानो हमारे लिए सब कुछ ख़त्म हो गया."

गुलाब जान की पढ़ाई छूट गई क्योंकि स्कूल दूर था और वहाँ तक चल कर जाना संभव नहीं था. गुज़ारे के लिए ये माँ और बेटियाँ बैसाखियों पर ही अपने खेत में घास वगैरह काटकर और अन्य छोटे काम कर के कुछ काम कर लेती.

फ़ातिमा के ससुराल वाले भी भले लोग थे वो उसे शादी करके ले गए और फ़ातिमा को तीन बच्चे भी हुए. "लेकिन अभी बच्चे छोटे-छोटे ही थे कि चरमपंथियों ने मेरे पति को मार डाला." फ़ातिमा अपनी शॉल से आँसू पोछते हुए बोली.

उम्मीद

अब इस शिविर के बारे में जब पता चला तो दोनों मानो नए जीवन की तलाश में यहाँ पहुँच गए. सेना ने ये शिविर ग़ैर सरकारी संस्थानों की सहायता से लगाया है. लोगों को पहले भी ग़ैर सरकारी संस्थाएँ नकली टाँगें देती थीं लेकिन इसके लिए उन्हें जयपुर और दिल्ली जाना पड़ता था.

शिविर का आयोजन ग़ैर सरकारी संस्थाओं की मदद से किया गया

इस आयोजन से जुड़े सैनिक अधिकारी बिग्रेडियर आइएस सिंह ने कहा,"इस शिविर से हमने प्रयास किया है कि इन लोगों के पास ये नकली टाँगें पहुँच जाएँ."

सेना ने चरमपंथी हिंसा से प्रभावित ज़िले पुंछ, राज़ौरी, डोडा, उधमपुर और कश्मीर घाटी के अनंतनाग से भी ऐसे विकलांगों को इस शिविर तक पहुँचाने का ही नहीं बल्कि रहने और खाने-पीने का भी प्रबंध किया था.

चरमपंथी हिंसा, बारूदी सुरंगों का विस्फोट और सरहद पार गोलाबारी की वज़ह से कई लोग अपने अंग गँवा चुके हैं. राज्य सरकार के पास ऐसे लोगों की सही संख्या तो उपलब्ध नहीं है लेकिन इस शिविर में 350 से अधिक लोगों को नकली टाँगें लगाईं गईं.

 चाहे यहाँ इतनी सर्दी है, रास्ते कठिन हैं और डर भी है लेकिन मन में बहुत ख़ुशी है. यहाँ आकर इन लोगों को टाँग दे कर जो सुकून मुझे मिला वो मुझे कहीं नहीं मिला
राजू शर्मा

ये बहनें अभी हम से बात कर ही रही थीं कि दिल्ली से आए राजू शर्मा और उनकी 15 सदस्यीय टीम इन महिलाओं की टाँगें लगाने में जुट गई. नाप लेने से लेकर टाँग लगाने में केवल एक घंटा ही लगा. दोनों लड़कियों को जब टाँगें लगाईं गईं तो ऐसा लगा कि वो उड़ना चाहती हों.

अपने जीवन में अनगिनत टाँगें लगा चुके राजू शर्मा ने कहा,"चाहे यहाँ इतनी सर्दी है, रास्ते कठिन हैं और डर भी है लेकिन मन में बहुत ख़ुशी है. यहाँ आकर इन लोगों को टाँग दे कर जो सुकून मुझे मिला वो मुझे कहीं नहीं मिला."

राजू और सेना को दुआएँ देते हुए दोनों बहनें अब क्या करना चाहती हैं. गुलाब जान बोली,"मैं तो सिलाई-मशीन लेकर लोगों के कपड़े सिलकर अपना गुज़ारा किया करूंगी."

सेना के कमांडर ने उसे सिलाई-मशीन दिलवाने का आश्वासन दिया है. और फ़ातिमा खेतों में काम करके अपना और अपने बच्चों का गुज़ारा किया करेगी. इतने में हमारे पास मोहम्मद इक़बाल आए जो नियंत्रण-रेखा के पास रहते हैं. उन्होंने 1972 में मवेशी चराते हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में अपनी दाहिनी टाँग खो दी थी.

वो कहते हैं,"मुझे देखो मैं बैसाखियों पर यहाँ आया था पर अब चल कर जा रहा हूँ. क़रीब 35 साल हो गए मुझे टाँगें खोए हुए पर अब ये नकली टाँग लगवाकर ख़ुद को ज़वान महसूस कर रहा हूँ."

आँखों में ख़ुशी भरे आँसू लिए इक़बाल बोले,"इतने लोगों को टाँगें दे कर हमारी फ़ौज ने बता दिया कि वो न सिर्फ़ हमारी रक्षा करती है बल्कि हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर सहारा भी देती है."

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