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शुक्रवार, 23 फ़रवरी, 2007 को 14:21 GMT तक के समाचार
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जनसेवा मानों जुनून है विनायक के लिए

विनायक नारायण अपने ऑटो के साथ
कई हादसों को याद करते हुए विनायक की आँखें नम हो जाती हैं
विनायक नारायण नवी मुंबई के पास मुंबई-पुणे हाइवे और वाशी, बेलापुर, नवी मुंबई जैसी जगहों के लिए किसी भगवान की तरह हैं.

इस हाइवे पर रोज़ाना 2-3 या इससे भी ज़्यादा दुर्घटनाएँ होती हैं और उन सबकी मदद के लिए 52 वर्षीय विनायक वहाँ पलक झपकते ही पहुँच जाते हैं.

इन्होंने अपना मोबाइल नंबर आसपास के सारे पुलिस स्टेशन और अस्पताल के अलावा अपने ऑटो पर भी लिखवा रखा है और साथ ही यह भी साफ़ तौर पर यह भी लिखा दिया है कि वो किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ नहीं हैं.

बचपन से ही वे समाज के लिए कुछ करना चाहना चाहते थे लेकिन मौका नहीं मिल रहा था. क़रीब दस साल तक इन्होंने मेडिकल रिप्रेंज़ेंटेटिव का काम किया फिर कंपनी में हड़ताल के चलते उन्हें वो नौकरी छोड़नी पड़ी.

कुछ दिन नौकरी में तलाश करते रहे और फिर कुछ अपना काम करने का मन बनाया. फिर उन्हें ऑटो रिक्शा चलाने का खयाल आया.

ऑटो चलाते-चलाते विनायक ने ऐसे कई सड़क हादसे देखे जिन्हें पुलिस के डर से कोई छूता तक नहीं था. फिर इन्हें ख़याल आया कि इससे अच्छा काम भला क्या हो सकता है.

पनवेल के रहने वाले विनायक कहते हैं, “मुझे पैसे से कोई लेना देना नहीं होता है. मेरे घरवालों को आराम से दो वक्त की रोटी मिलती है और मैं इस उम्र में भी बिना किसी रोग के चल रहा हूँ इससे बड़ी भगवान की और क्या कृपा हो सकती है.”

मुफ़्त सेवा

शुरू के दिनों में इन्हें भी पुलिस और समाज के लोगों से दो-चार होना पड़ा था.

 अस्पताल ले जाने के बाद जब मरीज़ के घरवाले आते हैं तो वे मुझसे कहते हैं कि तुम इसे किसी बड़े अस्पताल में लेकर क्यों नहीं गए. लेकिन मैं भी क्या करूं जो अस्पताल नज़दीक है मैं वहीं लेकर जाता हूँ
विनायक नारायण

लोगों के दिमाग में यह बात आनी स्वाभाविक थी कि आखिर क्यों कोई बिना किसी मतलब के किसी की सहायता करेगा. इस पर वे कहते हैं, “धीरे धीरे सबको समझ में आ गया कि इसमें मेरा अपना कोई फायदा नहीं है तो लोग मेरी मदद करने लगे. आज मुझे लगता है कि मैं सिर्फ एक रिक्शा ड्राइवर नहीं हूँ बल्कि लोगों की नज़रों में एक अच्छा इंसान हूँ. मैं भगवान का बहुत आभारी हूँ कि उसने इस काम के लिए मुझे चुना.”

आज पुलिस वालों से लेकर अस्पताल तक, हर कोई विनायक की मदद करता है. फिर चाहे इनका मोबाइल कार्ड का रिचार्ज हो या फिर फिर किसी गरीब मरीज़ के लिए पैसे की दिक्कत हो.

उनका मोबाइल कार्ड खत्म होने पर पुलिस वाले रिचार्ज करवाते हैं और किसी ग़रीब मरीज के लिए कोई समाजसेवक या ऐसे लोग मदद कर देते हैं. विनायक कहते हैं, "हर पुलिसवाला ख़राब भी नहीं होता."

कई बार तो इन्हें घायल मरीज़ को अस्पताल तक ले जाने का भाड़ा तक नहीं मिल पाता. वैसे वे कोई भाड़ा नहीं लेते हैं लेकिन अगर मरीज़ के रिश्तेदारों ने दिया तो सिर्फ पेट्रोल का पैसा ले लेते हैं. लेकिन कई बार पैसा तो दूर, इन्हें गाली तक खानी पड़ती है.

विनायक कहते हैं, “अस्पताल ले जाने के बाद जब मरीज़ के घरवाले आते हैं तो वे मुझसे कहते हैं कि तुम इसे किसी बड़े अस्पताल में लेकर क्यों नहीं गए. लेकिन मैं भी क्या करूं जो अस्पताल नज़दीक है मैं वहीं लेकर जाता हूँ.”

सोन्या मारुति

उनके परिवार में पत्नी के अलावा तीन बेटे और एक बेटी हैं. पिछले 20 सालों से वे यह काम कर रहें हैं और समय समय पर इन्हें प्रोत्साहन देने वालों की भी कमी नहीं है.

इनकी हिम्मत बढ़ाने के लिए कई रोटरी क्लब, लायन्स क्लब जैसी संस्थाओं ने इन्हें सम्मानित भी किया है.

लेकिन इससे इन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती है. उनके अनुसार, सम्मान में ये लोग मुझे नारियल, शॉल देते हैं जिसमें पैसा नहीं होता है इसलिए मुझे इससे कोई ख़ास मदद नहीं मिलती है लेकिन मुझमें काम करने का जज़्बा ज़रूर भर जाता है.

विनायक नारायण
विनायक नारायण कहते हैं कि घायलों की जान बच जाए तो उन्हें अपना काम सार्थक हुआ सा लगता है

पुलिस स्टेशन, अस्पताल और आसपास के इलाकों में उन्हें लोग 'सोन्या मारूति' के नाम से जानते हैं. जिस तरह से रामायण में 'मारूति' यानी हनुमान जी हर किसी की मदद करने के लिए कहीं भी पहुँच जाता था इसी तरह से विनायक भी लोगों की मदद के लिए दूर दूर तक जाया करते हैं और लोगों ने उनका भी नाम 'सोन्या मारूति' रख दिया.

कभी कभी दूसरों की मदद करते करते खुद उनकी आंखें नम हो जाती हैं.

जैसे हाल ही में एक मोटरसाइकल और साइकल की टक्कर हो गई और दोनों को उन्होंने अस्पताल में दाखिल करवाया. लेकिन सुबह होते होते साइकिल वाले की मौत हो गई.

विनायक बताते हैं, "जब मैंने उसके घर पर फ़ोन किया तो पता चला कि उसकी पत्नी माँ बनने वाली है और डिलीवरी के लिए अपने मायके गई हुई है. मैंने पत्नी से बात की और कहा कि अगर तुम नहीं आ सकती तो मैं ही उसके पति की लाश लेकर आ जाता हूँ. लेकिन वो वहाँ से निकल चुकी थी."

यह बताते हुए विनायक अपने आँसुओं को नहीं रोक पाते.

विनायक के जनसेवा के समर्पण का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर कभी ये कुछ दिन या फिर कुछ समय के लिए बाहर रहते हैं तो अपनी जगह पर किसी को बाक़ायदा अपने काम की ज़िम्मेदारी देकर जाते हैं.

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