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हाथरिक्शा चलाने पर लगी रोक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक समय कोलकाता की पहचान माने जाने वाला हाथरिक्शा अब केवल किस्से-कहानियों की बात हो जाएगा. पश्चिम बंगाल की विधानसभा ने एक विधेयक पारित कर दशकों पुराने इस यातायात के साधन पर पाबंदी लगाने का प्रावधान है और इसे अमानवीय बताया है. कोलकाता हैकनी कैरेज (संशोधन) विधेयक 2006 को विधानसभा ने बहुमत से पारित किया. सत्ताधारी वाम गठबंधन ने इसके पक्ष में लेकिन कांग्रेस और त्रिणमूल कांग्रेस ने इसका विरोध किया. चीन से आया हाथरिक्शा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने हाल में कहा था, "पश्चिमी देशों के लोग भिखारियों और हाथरिक्शा को कोलकाता के साथ जोड़कर देखते हैं लेकिन ये कोलकाता का प्रतीक नहीं हैं. हमारे महानगर का प्रतीक समृद्धि और विकास है." कोलकाता के मेयर बिकाश रंजन भट्टाचार्य का कहना था, "यातायात के इस अमानवीय साधन को कई साल पहले ही बंद कर देना चाहिए था." चीन से आने वाले व्यापारियों ने 20वीं सदी में कोलकाता में हाथरिक्शा की शुरुआत की थी. लेकिन चीन ने 1949 की क्रांति के बाद वहाँ इसे चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. अब कुपोषण का शिकार, नंगे पैर चलते लोग इन्हें चलाते हैं और दिन में लगभग सौ रुपए के करीब कमाते हैं और रात को फ़ुटपाथ पर सो जाते हैं. उचित व्यवस्था की उम्मीद इनमें से कई लोग पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्यों में से हैं. बंगाल रिक्शा चालक यूनियन के मोहम्मद असलम का कहना है,"हमें उम्मीद है कि सरकार कोई उचित व्यवस्था करेगी ताकि इस काम में जुटे हज़ारों लोग ख़ुद को असहाय स्थिति में न पाएँ." 'दो बीघा ज़मीन' और 'सिटी ऑफ़ ज्वाय' जैसी फ़िल्मों में हाथरिक्शा चलाने वाले के दुख-दर्द का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है. एक्शन एड नाम की एक ग़ैर सरकारी संस्था के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ कोलकाता में 18 हज़ार हाथरिक्शा चालक हैं और हर वर्ष लगभग दस प्रतिशत नए लोग इस काम से जुड़ते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें चलता फिरता टेलीफ़ोन बूथ06 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस कोलकाता में रिक्शों की अनूठी दौड़01 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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