|
कोलकाता में रिक्शों की अनूठी दौड़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चिलचिलाती धूप और बरसात की परवाह नहीं करते हुए भारी-भरकम सवारियों को बिठाकर रोजाना सुबह से शाम तक कोलकाता की ऊबड़-खाबड़ और संकरी गलियों में भागने वाले उस दिन खाली रिक्शा लेकर अपने लिए भाग रहे थे. जहाँ रोज सवारियों के साथ किराए को लेकर कहासुनी आम बात हो, वहाँ इस भागने के पहले ही मिली लुंगी और गमछे ने उनके चेहरे पर प्रसन्नता भर दी थी. यही नहीं, जीतने पर इनाम के तौर पर कंबल, शॉल और टी-शर्ट भी मिले. मौका था पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हाथ से रिक्शा खींचने वालों की दौड़ का. इसका आयोजन इन रिक्शेवालों का जीवनस्तर सुधारने में जुटी एक गैर-सरकारी संस्था ‘सर्व द नेशन’ ने किया था. इस संगठन के कर्ताधर्ता रेवरेंड माइकल झा बताते हैं कि "इस दौड़ का आयोजन रिक्शावालों की दयनीय स्थिति को आम लोगों के समक्ष लाना और यह जताना था कि वे भी इसी समाज के अंग हैं. हम लोगों को यह एहसास दिलाना चाहते थे कि रोजी-रोटी की मजबूरी में रिक्शा खींचने वाले यह लोग भी इंसान ही हैं, मशीन नहीं." कोलकाता का यह रिक्शा अब तक प्रतिकूल वजहों से ही चर्चा में रहा है. यह पहला मौका था जब बिहार और झारखंड से आकर अपनी रोजी-रोटी कमाने वाले इन लोगों को टीवी कैमरे के सामने बोलने का मौका मिला. उनकी तस्वीरें भी अखबारों में छपी. अपने तरह की इस अनूठी दौड़ में करीब सौ लोग शामिल हुए. इनको उम्र के हिसाब से अलग-अलग वर्गों में बांटा गया था. इस दौड़ में शामिल झारखंड के गिरीडीह निवासी मोहम्मद जमीरुद्दीन कहते हैं कि "हम रोज दूसरों को लेकर सड़कों पर दौड़ते हैं. आज हमने अपने लिए दौड़ लगाई है." वे कहते हैं कि "हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हमारी फोटो खींची जाएगी और टीवी पर हमको दिखाया जाएगा." इस अनूठे आयोजन का साक्षी बनने के लिए कुछ विदेशी पर्यटक भी सूचना पाकर रामलीला पार्क में पहुँच गए थे. इस प्रतियोगिता में शामिल ज्यादातर रिक्शावाले बिहार और झारखंड के थे. दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद वे साठ से सत्तर रुपए तक ही कमा पाते हैं. इसमें शामिल अच्छेलाल ने रेस के बाद कहा कि "इस दौड़ में शामिल होकर बहुत अच्छा लगा. आखिर रोज हम सवारियों को लेकर इसी रफ्तार से दौड़ते हैं. आज खाली रिक्शा लेकर अपने लिए दौड़ने का मजा ही कुछ और था." आयोजक कहते हैं कि "इस आयोजन का एक मकसद रिक्शावालों में आत्मसम्मान की भावना पैदा करना भी था." |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||