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मंगलवार, 20 फ़रवरी, 2007 को 00:19 GMT तक के समाचार
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पहाड़ों को भी नहीं बख़्शा चुनाव प्रचार में

चुनाव प्रचार
सभी राजनीतिक दलों के नारे लिखे हैं पहाड़ों पर
एक ओर चुनाव आयोग के सख़्त निर्देश हैं कि दीवारों पर चुनावी नारे न लिखे जाएँ.

तो दूसरी ओर राजनीतिक दल पहाड़ों को भी नहीं बख़्श रहे हैं.

पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड में चुनाव हो रहे हैं और वहाँ अपना प्रचार करने के लिए राजनीतिक दलों ने सड़क के किनारों पहाड़ों और पेड़ों पर चुनाव चिन्ह और नारे लिख रखे हैं.

राज्य चुनाव आयोग का मानना है कि यदि किसी राजनीतिक दल ने पहाड़ों पर नारे लिखे हैं तो यह आचार संहिता का उल्लंघन है और इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.

यदि इसे चुनाव की दृष्टि से न देखें तो भी यह पर्यावरण क़ानूनों के उल्लंघन का मामला भी दिखता है.

उल्लेखनीय है कि हिमाचल की एक पहाड़ी पर शीतल पेय का विज्ञापन करने वाली कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट ने विज्ञापन मिटाने के आदेश दिए थे और इसके लिए दंडित भी किया था.

नज़र से दूर

लेकिन उत्तराखंड के विज्ञापनों पर अभी न तो सुप्रीम कोर्ट की नज़र गई है और न चुनाव आयोग की.

लेकिन अगर आप उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों से गुज़रें तो जगह-जगह पहाड़ों पर चुनावी दलों के नारे लिखे दिख जाते हैं.

और इसमें कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं है. कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी सबने अपने नारे या चुनाव चिन्ह पहाड़ों पर उकेरे हैं.

कांग्रेस का चुनाव प्रचार
सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि पहाड़ों पर विज्ञापन करना पर्यावरण का नुक़सान है

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह तो कई जगह ऊँचे पेड़ों पर लिखा दिखाई देता है.

ख़ासकर जब आप टिहरी गढ़वाल से चम्बा के रास्ते देहरादून जा रहे हों तो चुनावी नारों की भरमार नज़र आती है.

इस बारे में जब उत्तराखंड के चुनाव सचिव एन रविशंकर से पूछा गया तो उनका साफ़ कहना था कि पहाड़ों को गंदा करना सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाना हैं.

उन्होंने कहा, "अगर किसी ने पहाड़ पर चुनावी नारे लिखे हैं तो ये आचार संहिता का उल्लंघन है.संबंधित जिलाधिकारियों से बात करके इस बारे में सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिये जाएंगे. "

हालांकि अब चुनाव को एक दिन ही बचा है और पता नहीं कि इसमें चुनाव आयोग की नज़र इस पर जाती भी है या नहीं.

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