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रविवार, 18 फ़रवरी, 2007 को 12:45 GMT तक के समाचार
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सशंकित हैं उधमसिंह नगर के सिख

सिख किसान प्यारा सिंह
विभाजन के बाद से ही सिख किसान प्यारा सिंह उधमसिंह नगर में रह रहे हैं.
जब उत्तराखंड राज्य बना था तो पूरा राज्य ख़ुश था. ख़ुश नहीं था तो सिर्फ़ उधमसिंह नगर.

उधमसिंह नगर के ज़्यादातर लोग चाहते थे कि उनके ज़िले को उत्तराखंड में मिलाने की बजाय उत्तर प्रदेश में ही रहने दिया जाए.

यह माँग ज़्यादातर सिख किसानों की ओर से आई थी जिनकी संख्या उधमसिंह नगर में हज़ारों में है.

उन्हे डर था कि उत्तराखंड में रहे तो उनकी ज़मीनें छीन ली जाएँगीं और उन्हें राज्य छोड़कर जाने को कहा जाएगा.

राज्य बनने से सात साल बाद ज़मीन छीने जाने का डर तो उनके मन से ज़रुर निकल गया है लेकिन उन्हें आज भी उत्तराखंड की जगह उत्तर प्रदेश ज़्यादा पसंद आता है.

उन्हें लगता है कि सरकार ने उनके लिए कुछ किया तो नहीं लेकिन जो नियम क़ानून बनाए गए हैं वे उनकी परेशानियों को बढ़ाने वाले हैं.

शिकायत

ये सिख किसान विभाजन के समय पाकिस्तान छोड़कर यहाँ आए थे.

सरकार ने उन्हें पट्टे पर ज़मीनें दीं लेकिन पूरा मालिकाना हक़ नहीं दिया. ज़्यादातर लोगों को 3-3 एकड़ ज़मीन मिली. कुछ को 12 एकड़ तक भी मिली. लेकिन 12 एकड़ की सीलिंग थी.

 हमारे बच्चे जब पहाड़ों पर नौकरी करने जाते हैं तो उसके साथ अलग बर्ताव किया जाता है
प्यारा सिंह, सिख किसान

विभाजन के समय से ही यहाँ रह रहे प्यारा सिंह बताते हैं, “जब हम यहाँ आए तो जंगल हुआ करते थे और बाघ घूमा करते थे. हमने बंज़र ज़मीनों को समतल करके खेती लायक बनाया. जी तोड़ मेहनत करनी पड़ी.”

वे बताते हैं कि तब किसानों को कई-कई मील तक अपने सिर पर डीज़ल लेकर खेतों तक जाना पड़ता था कि पंप चल सके. लेकिन उन्हें अफ़सोस है कि अभी तक ज़मीन पर उनका मालिक़ाना हक़ नहीं है.

ऐसा नहीं है कि उन्हें हक़ नहीं मिल रहा है, मिल रहा है. लेकिन एक एकड़ ज़मीन के लिए पचास हज़ार रुपए सरकारी ख़जाने में जमा करने होंगे और दूसरे ख़र्च अलग.

सिखों को इससे भी शिकायत है. बुज़ुर्ग किसान प्रीतम सिंह कहते हैं, “दो लाख की ज़मीन ख़रीदो और दो लाख हक़ लेने के लिए देना पड़ेगा और 20 गुना लगान जमा करना होता है सो अलग.”

विरोध

खेत
अपने खेतों को लेकर सिख किसान बहुत चिंतित रहते हैं

उधमसिंह नगर के मुख्य शहर रुद्रपुर में बहुत से लोगों से बात करने पर यह बात साफ़ होने लगती है कि ग़ैर-सिख़ों का नज़रिया क्यों अलग है.

एक एकड़ के किसान सईद अहमद रुद्रपुर से पाँच किलोमीटर दूर मलसी में रहते हैं. वे बताते हैं कि सिख बड़े किसान हैं. उनका कहना है, “हज़रतपुर की ओर दो-दो सौ एकड़ के भी सरदार किसान हैं. सरदारों के पास बड़ी ज़मीनें हैं.”

और लोगों का कहना है कि कुछ सिख किसान चार सौ एकड़ पर भी खेती कर रहे हैं.

लेकिन सिख किसान इसे ग़लत बताते हैं. उनका कहना है कि जब सरकार ने 12 एकड़ की सीलिंग लगा रखी है तो किसी किसान के पास इतनी बड़ी ज़मीन कैसे हो सकती है.

प्रीतम सिंह कहते हैं, “कई किसान या परिवार मिलकर काम करना चाहें तो इसे किसी एक का तो नहीं माना जा सकता.”

सईद अहमद तो सिख किसानों से ज़मीन वापस लेने के पक्षधर नहीं हैं लेकिन ऐसे कई लोग हैं जो मानते हैं कि उनकी ज़मीनें वापस लेकर पहाड़ के उत्तराखंडियों में बाँट देनी चाहिए.

आश्वासन

हालांकि नैनीताल के दौरे पर गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिखों की इस आशंका को ख़त्म कर दिया कि उनकी ज़मीन कभी वापस ले ली जाएगी.

इसके बाद सिख मान तो रहे हैं कि सरकार उनकी ज़मीनों का अधिग्रहण नहीं करेगी. लेकिन उनकी आशंकाएँ ख़त्म नहीं हुई हैं.

प्यारा सिंह कहते हैं कि डर दूसरी तरह का है और अच्छा होता कि उधमसिंह नगर उत्तर प्रदेश में ही होता. हालांकि इस डर का विवरण नहीं देते.

लेकिन सिख समुदाय के कई बुज़ुर्गों से बातचीत में साफ़ होता है कि यह डर पहाड़ों में रहने वाले लोगों से है जो अभी भी इन सिखों को ‘बाहरी’ मानते हैं.

प्यारा सिंह संकेत देते हैं, “हमारे बच्चे जब पहाड़ों पर नौकरी करने जाते हैं तो उसके साथ अलग बर्ताव किया जाता है.”

इस बीच रुद्रपुर में स्माल इंडस्ट्रीज़ डेवलपमेंट कार्पोरेशन ऑफ़ उत्तरांचल लिमिटेड यानी सिडकुल ने वहाँ औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया है और कोई सवा तीन सौ उद्योग लगाए हैं.

इससे ज़िले की तस्वीर कुछ बदली है और लोगों को रोज़गार मिल रहा है.

सिख भी खेती के अलावा दूसरे व्यावसायों में दिखाई देने लगे हैं.

लेकिन उनसे बातचीत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि उनकी आशंका अभी ख़त्म नहीं हुई है और यह आशंका निर्मूल भी दिखाई नहीं देती.

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