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रविवार, 04 फ़रवरी, 2007 को 18:05 GMT तक के समाचार
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'और कोई देश नहीं है ऐसा...'

भारत
मार्क टली मानते हैं कि भारत जैसा सांप्रदायिक सौहार्द कहीं और मिलना मुश्किल है
भारत की पहचान उसकी अनेकता में एकता की है और ये ख़ासियत किसी और देश में नहीं है.

कुछ लोग अमरीका की अनेकता में एकता की बात करते हैं मगर वो देश तो अभी बहुत नया है, वहाँ तो एक ही भाषा बोली जाती है.

वहाँ भारत जैसी ख़ूबसूरती नहीं है. वहाँ ऐसे पहाड़ और गंगा जैसी ऐतिहासिक नदियाँ नहीं है. भारत ने न सिर्फ़ भाषा में, धर्म में, गाँवों में बल्कि हर चीज़ में अनेकता में एकता दिखाई है.

भारत में जातिवाद है और कभी-कभी सांप्रदायिक दंगे-फ़साद भी होते हैं मगर हर देश में कोई न कोई दिक़्क़त परेशानी तो होती ही है.

आप देखिए भारत में कितने मुसलमान, सिख, ईसाई रहते हैं. हर रोज़ वे अपने धार्मिक स्थलों पर जाते हैं. वे चाहें तो मदरसों में जा सकते हैं और न चाहें तो न जाएँ. ऐसा देश दुनिया में कहीं नहीं है.

ब्रिटेन में ही आप देख लीजिए, एक विवाद शुरू हो गया कि मुसलमान औरतों को बुरक़ा पहनना चाहिए या नहीं. भारत में ऐसा विवाद नहीं हो सकता. सवाल ही पैदा नहीं होता.

'विकास में विरोधाभास'

ये दुःख की बात है कि भारत में विकास में एक विरोधाभास दिख रहा है. गाँव में विकास पहुँच नहीं रहा है जबकि शहरों में लगातार विकास बढ़ रहा है.

भारतीय गाँव
'गाँव का विकास महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर करना होगा'

सबसे जाने-माने भारतीय- महात्मा गांधी ने कहा था कि विकास गाँव से शुरू करना चाहिए. भारत ने ग़लत रास्ता ये अपनाया कि उसने बड़े लोगों से, अमीरों से, ऊपर से विकास शुरू किया.

भारत जब तक गाँव का विकास नहीं करता, ग़रीबों का विकास नहीं करता है, ये विरोधाभास बना रहेगा.

मेरे विचार से जब तक ये विकास उपभोक्तावाद पर चलेगा ये गाँव तक नहीं पहुँचेगा.

भारत के लोग जब तक अपनी पुरानी संस्कृति, महात्मा गांधी के सिद्धांत पर विकास नहीं करते हैं ये विकास गाँव तक नहीं पहुँचेगा.

मीडिया की भूमिका

अगर हम आज के भारतीय मीडिया की बात करें तो यहाँ भी उपभोक्तावाद दिख रहा है. आज का मीडिया बिज़नेस बन गया है और बिज़नेस का मक़सद होता है पैसा कमाना.

मैं जब बीबीसी में था या आज भी बीबीसी में मक़सद ख़बर देना ही है. हमने कभी नहीं सोचा कि हमारे श्रोता कितने होंगे या नहीं होंगे. हमारी प्राथमिकता रहती थी ख़बर देना, सही ख़बर देना.

इस बात में कुछ हद तक सच्चाई हो सकती है, जो मीडिया कहती है कि ‘लोग जो देखना चाह रहे हैं हम उन्हें वही दिखा रहे हैं.’ मगर ये पूरी सच्चाई नहीं है.

अगर आप ग़लत चीज़ें दिखाते हैं तो कुछ लोग तो इसे ज़रूर पसंद करेंगे मगर इसका मतलब ये तो नहीं है कि आप ग़लत चीज़ें ही दिखाना शुरू कर देंगे.

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