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आर्थिक सफलता: कारण और संभावनाएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की बढ़ती आर्थिक पैठ का मुख्य कारण संतुलित उदारीकरण है. वर्ष 1991 के बाद कांग्रेस तथा भाजपा सरकारों ने ताबड़तोड़ बाहरी उदारीकरण अपनाने का प्रयास किया था. सीधे विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए हमारे वित्त मंत्री विदेशों में रोड शो आयोजित कर रहे हैं. आयात दरों को तेज़ी से घटाने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन स्वदेशी और वामपंथी विरोध के कारण दोनो सरकारें अपनी इस मंशा में सफल नहीं हुईं. बाद में बाहरी उदारीकरण की गति धीमी हो गई और घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा में खड़े होने का पर्याप्त अवसर मिल गया. सरकार ने मजबूरी से पहले घरेलू उदारीकरण तथा बाद में बाहरी उदारीकरण के फॉर्मूले को अपनाया और इसके सुखद परिणाम आने लगे. उन्नीसवीं सदी में विश्व अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा कम हो गया था. बीसवीं सदी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा कम हो गया है. ऐसे में भारत की वर्तमान सफलता का दूसरा पक्ष सेवा क्षेत्र का विस्तार है. दोश की आय में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 54 फ़ीसदी है और यह तेज़ी से बढ़ रहा है. सेवा क्षेत्र में मुख्य रूप से बौद्धिक कार्य आते हैं. मसलन सॉफ्टवेयर, सिनेमा, संगीत, अनुवाद, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, कॉल सेंटर आदि. संयोग की बात है कि भारतीय संस्कृति भी बुद्धि के विकास पर जोर देती है. हमारी अनेक परंपराएं इसी उद्देश्य से बनाई गई हैं, जैसे माथे पर टीका लगाना, मंदिर में मीठा प्रसाद बाँटना, झुक कर प्रणाम करना, पीपल के वृक्ष की पूजा करना आदि. सेवा क्षेत्र के लिए इसी तरह का बौद्धिक विकास सहायक है, इसीलिए विश्व अर्थव्यवस्था में भारत अपनी पैठ बना रहा है. सस्ता श्रम और वाणिज्यिक संस्कृति भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य उज्ज्वल है. विशाल जनसंख्या के कारण श्रम की पर्याप्त आपूर्ति बनी रहेगी और वेतन न्यून बने रहेंगे. साथ-साथ हमारी व्यापारिक गतिविधियाँ जोर पकड़ेंगी. ध्यान रहे कि इतिहासकार भारत को मर्केंटाइल सिविलाइजेशन की संज्ञा देते हैं. भारतीय व्यापारियों की विश्व व्यापार में पिछले पाँच हज़ार वर्षों में पकड़ समय-समय पर रही है.
कम वेतन और आक्रामक व्यापार के संयोग से भारतीय अर्थव्यवस्था दिनोंदिन बढ़ेगी. दूसरे देशों के लिए इस दोहरी शक्ति का मुक़ाबला करना कठिन होगा. पश्चिमी देश ऊँचे वेतन के कारण पिछड़ जाएँगे, जबकि चीन एवं पूर्वी एशिया के देश वाणिज्यिक संस्कृति के अभाव से. इसलिए भारत का विश्व अर्थव्यवस्था में नंबर वन बनना सुनिश्चित लगता है. इस दिशा में मुख्य समस्या सुशासन स्थापित करने की है. देश के तमाम क़ानून इस प्रकार बनाए गए हैं जो सरकारी तंत्र की वसूली को बढ़ावा देते हैं. मसलन एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि प्रत्येक ट्रक मालिक साल में 80 हज़ार रुपए की घूस विभिन्न विभागों को देता है. यह रकम सरकारी कर्मचारियों के भोग विलास में लग जाती है. कम वेतन तथा वाणिज्यिक संस्कृति से उत्पन्न हुए लाभ को भ्रष्टाचार काट देता है. यदि भ्रष्टाचार अधिक हुआ तो भारत नंबर एक अर्थव्यवस्था बनने से चूक जाएगा. दूसरी समस्या आम आदमी को राहत पहुँचाने की है. वर्तमान सरकार रोज़गार गारंटी, अंत्योदय एवं सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों से आम आदमी को राहत पहुँचाने के प्रयास कर रही है. लेकिन इन कार्यक्रमों का सफल होना संदिग्ध है क्योंकि इनमें भरपूर भ्रष्टाचार है. इसके अलावा अगर आम आदमी को राहत मिल भी जाए तो उसका उद्धार होने की संभावना भी बहुत कम है क्योंकि बाज़ार में माँग बनाने की नीतियाँ लागू नहीं की जा रही हैं. मसलन आईटीआई से प्रशिक्षण प्राप्त तमाम नवयुवक बेरोज़गार हैं. ज़रूरत आम आदमी द्वारा तैयार माल की बाज़ार में माँग बढ़ाने की है. जैसे पावरलूम पर टैक्स लगा देने से हथकरघा क्षेत्र में करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकता है. आर्थिक उदारीकरण का मूल सिद्धांत बाज़ार की ताकत के सहारे विकास करने का है. इस सिद्धांत को कल्याणकारी योजनाओं पर भी लगाने की ज़रूरत है. बाज़ार में टैक्स प्रणाली ऐसी बनानी होगी जिससे आम आदमी द्वारा तैयार माल को बड़ी कंपनी के माल से संरक्षण मिल सके. भारत के सामने दो चुनौतियाँ हैं. एक सरकारी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाने की और दूसरे आम आदमी द्वारा उत्पादित माल की बाजार में माँग बढ़ाने की. इन दोनों समस्याओं के उपचार के बाद भारत की विश्व विजय सुनिश्चित है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'भारत ब्रिटेन को पीछे छोड़ देगा'24 जनवरी, 2007 | कारोबार 'वैश्वीकरण से नुकसान हो सकता है'20 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस देश का चेहरा बदलने को तैयार हैं मित्तल27 नवंबर, 2006 | कारोबार अर्थव्यवस्था में उम्मीद से अधिक तेज़ी29 सितंबर, 2006 | कारोबार अपने-अपने इंडिया, अपने-अपने भारत10 अगस्त, 2006 | कारोबार भारत ब्रिटेन में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक 05 जुलाई, 2006 | कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ24 जून, 2006 | कारोबार भारतीय निर्यात सौ अरब डॉलर से ज़्यादा07 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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