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अपने-अपने इंडिया, अपने-अपने भारत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज़ादी के साठ साल बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में जो कुछ कहा जा सकता है, उसका उल्टा भी उतना भी सच साबित हो सकता है. भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत स्थिति में है, करीब नौ प्रतिशत सालाना की रफ़्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था में सिर्फ़ एक टेलीफ़ोन कंपनी भारती एयरटेल के पास ही करीब ढ़ाई करोड़ ग्राहक हैं. ये संख्या आस्ट्रेलिया की जनसंख्या से ज्यादा है. भारती एयरटेल ने यह काम करीब एक दशक में करके दिखाया. भूख का सवाल लेकिन इस तथ्य के विपरीत खड़ा तथ्य यह है कि 'सेंटर फार इनवायर्नमेंट एंड फ़ूड सिक्योरिटी' की एक रिपोर्ट ने राग रसवंती में रुदन राग घोल दिया है. इस अध्ययन में राजस्थान और झारखंड के चालीस गांवों पर ध्यान केंद्रित किया गया था. इस अध्ययन से साफ़ हुआ कि 99 प्रतिशत परिवारों में लगभग भुखमरी की स्थिति है. शोध में शामिल राजस्थान के आदिवासी परिवारों में से एक भी ऐसा नहीं था, जिसने पिछले पूरे साल में दोनों समय के भोजन का जुगाड़ कर लिया हो. राशन की दुकान के 'आइटम' इतने महँगे हैं, उनका उन चीज़ों को ख़रीदने का सामर्थ्य नहीं है.
संयुक्त राष्ट्र की फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइज़ेशन (एफ़एओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 17 देशों में भूखों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ी है, भारत इनमें से एक है. 'कस्टमर सर्विस' बेहतर हुई है, सरकारी टेलीफ़ोन कंपनियों के आक्रामक और पैसा वसूलकर काम करने वाले लाइनमैनों के मुकाबले निजी क्षेत्र के टेलीकर्मियों की संख्या बढ़ी है, जिनके कामकाज के बारे में उनकी कंपनियों के लोग आपसे फोन करके पूछते हैं कि हमारे कर्मियों का व्यवहार आपके साथ पर्याप्त नम्र था नहीं. हाँ, पश्चिम बंगाल में अवैध खनन करते हुए फँसे दसियों मज़दूरों के प्रति कोई नम्रता नहीं दिखाता. 'कस्टमर सर्विस' बेहतर हो गई है, पर मज़दूरों के प्रति दायित्वों में कमी हो गई है. भूखों की संख्या बढ़ी है. मोबाइलों की संख्या बढ़ी है. भारत में आने वाली कार कंपनियों की संख्या बढ़ी है. शेयर बाजार में निवेश करने वालों की संख्या बढ़ी है. शेयर बाज़ार ने नए अमीर बनाए हैं. 'अमीर-ग़रीब का फ़ासला' नई अर्थव्यवस्था की प्रतिनिधि कंपनी इनफ़ोसिस में जिन लोगों ने 1993 में 9600 रुपये लगाए थे, वे अब दो करोड़ रुपये से ऊपर की रकम के मालिक हैं. शापिंग मालों की संख्या बढ़ी है.
लेकिन विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें इतनी लगातार और बार-बार आ रही हैं कि अब अनेक लोगों को वे खबरें लगती ही नहीं हैं. उधर हीविट के दसवें सालाना सर्वेक्षण में स्पष्ट हुआ कि 2006 में भारत में कारपोरेट कर्मचारियों के वेतन-भत्ते आदि में औसतन 13.7 प्रतिशत का इज़ाफ़ा होगा. असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारी बता सकते हैं कि वहाँ वास्तव में कमाई कम हुई है. नए बेरोज़गारों की फौज ने मालिकों को और रोज़गार दाताओं को यह सुविधा उपलब्ध करा दी है कि वे सस्ते में नए कर्मियों से काम करा सकते हैं. काल सेंटरों की संख्या बढ़ी है. कुछ विशेषज्ञों की नज़र में इनमें काम कर रहे साइबर-कुलियों की संख्या भी बढ़ी है. एक सरकारी शोध संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक तमाम काल सेंटर में काम करने वालों की हालत 'रोम के गुलामों' से बेहतर नहीं है. अर्थव्यवस्था अच्छी हो रही है या अर्थव्यवस्था ख़राब हो रही है? असल बात ये है कि अर्थव्यवस्था का कुछ हिस्सा अच्छा हो रहा है, बहुत सा हिस्सा ख़राब हो रहा है. संक्षेप में, अर्थव्यवस्था अच्छी है, लोग बदहाल हैं. पर इसमें दोष अर्थव्यवस्था का नहीं है और न ही सेंसेक्स का है. मुंबई का सेंसेक्स कितना ही संवेदनशील हो, विदर्भ का किसान और असंगठित क्षेत्र का मज़दूर आख़िर कर ही क्या सकता है? |
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